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एनसीआर में कोरोना

चिंता की बात है कि महाराष्ट्र के बाद कोरोना संक्रमितों की दूसरी बड़ी संख्या दिल्ली में है। पिछले कुछ दिनों में हरियाणा में जिस तेजी से संक्रमितों की संख्या में इजाफा हुआ है, उसने राज्य सरकार की चिंता को बढ़ाया है। हालांकि, दिल्ली से सटे गुरुग्राम व फरीदाबाद में कोरोना संक्रमितों की संख्या हरियाणा की कुल संख्या का दो-तिहाई है। जाहिर है दिल्ली की सांसों से जुड़े इन शहरों को इस नजदीकी का खमियाजा भुगतना पड़ रहा है। कमोबेश यही स्थिति दिल्ली से सटे नोएडा व गाजियाबाद की भी है। हालांकि, तीनों राज्यों ने समय-समय पर बॉर्डर सील करके कोरोना से बचाव की कोशिशें कीं, मगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों की एक-दूसरे पर निर्भरता से यह कदम व्यावहारिक साबित नहीं हुआ। वैसे वक्त की जरूरत तो यह है कि एनसीआर से जुड़े राज्य दिल्ली सरकार के साथ मिलकर कोरोना के खिलाफ साझा लड़ाई लड़ते। इसके विपरीत दिल्ली सरकार ने दिल्ली के बाहर के मरीजों के लिए अस्पताल के रास्ते बंद करने का मन बना लिया था। नि:संदेह दिल्ली में स्वास्थ्य सुविधाओं का ढांचा एनसीआर के जनपदों से ज्यादा बेहतर और बड़ा है। यही वजह है कि दिल्ली की सुविधाओं के मद्देनजर एनसीआर में मजबूत चिकित्सा तंत्र विकसित ही नहीं हो पाया। आखिर दिल्ली का प्रदूषण व तमाम विसंगतियां झेलने वाले एनसीआर के लोगों के लिए कोरोना काल में यह बेरुखी औचित्यहीन थी इसमें वे लोग भी शामिल थे जो नोएडा-गाजियाबाद, गुरुग्राम व फरीदाबाद से रोज संक्रमण के जोखिम के बीच दिल्ली की आर्थिकी में योगदान के लिए दिल्ली जाते हैं और थके-मांदे घर लौटते हैं। इस मामले पर राजनीतिक विवाद बढऩे पर दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि दिल्ली के अस्पतालों में दिल्लीवालों का ही इलाज होगा। सरकारों के लिए किसी भी प्रदेश का निवासी देश का नागरिक होना चाहिए। मानवता के नाते भी हर बीमार को उपचार मिलना चाहिए।

नि:संदेह कोरोना काल में दिल्ली सरकार की नीति अनुचित और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की अवधारणा के भी खिलाफ थी, क्योंकि इन क्षेत्रों के लोग दिल्ली की अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से योगदान देते हैं। दिल्ली में महंगी प्रॉपर्टी के चलते ये तमाम कारोबारी, कर्मचारी व पेशेवर लोग दिल्ली में मकान न खरीद पाने के कारण पड़ोसी राज्यों के दिल्ली से सटे इलाकों में रहते हैं। इस संकटकाल में राष्ट्रीय राजधानी से जुड़े राज्यों के साथ मिलकर अरविंद केजरीवाल को कोरोना से लड़ाई का नेतृत्व करना चाहिए। इस लड़ाई के लिए राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली के पास उपलब्ध अनुभव-संसाधन एनसीआर के लिए लाभदायक हो सकते हैं। दरअसल, दिल्ली में तेजी से बढ़ते संक्रमण के आंकड़ों के बीच राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों में स्थिति विकट होने का खतरा बन गया है। इसकी वजह दिल्ली में तमाम कारोबारों व व्यवसायों में एनसीआर के लोगों की तेज आवाजाही है। अनलॉक की प्रक्रिया में तो संक्रमण का यह खतरा और बढ़ गया है, जिसके खिलाफ साझा लड़ाई दिल्ली व राज्यों के ही हित में है। ऐसे वक्त में, जब स्वास्थ्य मंत्रालय के दो वरिष्ठ विशेषज्ञों ने एक फार्मूले के आधार पर एक शोध एपिडेमियोलॉजी इंटरनेशनल जर्नल अंतर्राष्ट्रीय में छापा है, जिसमें भारत में कोरोना की समाप्ति का काल मध्य सितंबर बताया है तो दिल्ली एनसीआर में संक्रमण के विरुद्ध साझा लड़ाई की जरूरत और अधिक बढ़ जाती है। संभव है इन निष्कर्षों पर सवाल उठें, मगर देश में रोज दस हजार के करीब बढ़ते संक्रमितों की संख्या चिंता बढ़ाती है। एनसीआर में स्वास्थ्य सेवाओं को पुख्ता बनाने की जरूरत है क्योंकि सरकारों की घोषणा और उपचार की हकीकत में संजीदगी नजर नहीं आती। हमारे चिकित्सा तंत्र की परतें अब खुलती जा रही हैं, जिसमें बड़े बदलावों की जरूरत है। ऐसे में संक्रमण की जांच का दायरा भी बढ़ाने की जरूरत है। नागरिकों को भी हर तरह से संक्रमण से बचने की कोशिश करनी चाहिए।

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