एनआरसी का प्रश्न

केंद्र सरकार की असम की तर्ज पर अब देशभर में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने की घोषणा से कई तरह के सवाल और आशंकाएं पैदा होने लगी हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने बुधवार को संसद में इस घोषणा के साथ यह भी कहा कि इसे असम में फिर से दोहराया जाएगा। शाह की घोषणा के तुरंत बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दो टूक कह दिया कि वे अपने यहां एनआरसी लागू नहीं होने देंगी, जबकि असम में भाजपा सरकार के मंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने प्रदेश में अमल में आई एनआरसी को यह कहकर रद्द करने की मांग कर दी है कि इसे देश के साथ ही लागू किया जाना चाहिए। एनआरसी को लेकर असमवासियों के कटु व तकलीफदेह अनुभव रहे हैं। यह प्रक्रिया निर्विवाद भी नहीं रही। इसी कारण शाह की घोषणा के बाद यह आशंका जतायी जा रही है कि कहीं अब एनआरसी का मामला देश में नये राजनीतिक विवाद की भूमिका तो नहीं रख देगा। एनआरसी यानी देश के मूल निवासियों के रिकार्ड का रजिस्टर। यह सुप्रीमकोर्ट के फैसले तथा नागरिक संशोधन अधिनियम-2003 के तहत अस्तित्व में आया है। इसके तहत अब भारत में जन्म के आधार पर वही व्यक्ति नागरिक बन सकता है, जिसके माता-पिता, दोनों भारतीय हों। इनमें से कोई भी देश का अवैध नागरिक न हो। असम में इसे लागू करने की वजह वहां का आंदोलन रहा है, जो बांग्लादेशी घुसपैठियों को बाहर करने के लिए किया गया था। बांग्लादेशी घुसपैठ से असम की डेमोग्राफी बदलने लगी थी। असम में लागू एनआरसी के तहत लोगों से 24 मार्च 1971 से पहले जारी ऐसे दस्तावेज मांगे गए, जिनसे यह प्रमाणित हो जाए कि वे अथवा उनके पूर्वज इस तिथि से पहले असम में रहते थे। इस कवायद के बाद असम के 19 लाख लोग एनआरसी की अंतिम सूची से बाहर रह गए। अब वे खुद को भारतीय नागरिक साबित करने के लिए ट्रिब्यूनल के चक्कर काट रहे हैं। सुप्रीमकोर्ट के निर्देश पर शुरू इस प्रक्रिया को पूरा करने में लगभग 6 साल की लंबी अवधि के साथ ही 1,288 करोड़ रुपये खर्च हुए। प्रदेश की 3.3 करोड़ लोगों की नागरिकता की पहचान के लिए लगभग 50 हजार कर्मचारियों को लगाया गया।

इस प्रक्रिया में बड़ी आबादी को अपने ही देश में अपनी नागरिकता साबित करने के लिए बेहद दुखदायी व कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा। कई नामी लोग भी एनआरसी से छूट गए। 1971 के बाद बांग्लादेश से आए हिंदू भी एनआरसी से बाहर हो गए। यह भी सच्चाई है कि भारत में बांग्लादेशी घुसपैठियों के साथ ही म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमान और अफगानी समेत विभिन्न देशों के लोग अवैध तरीके से रह रहे हैं। बेशक देश को हमेशा के लिए धर्मशाला नहीं बनने दिया जा सकता। इसके बावजूद केंद्र सरकार को यह भी समझना होगा कि असम का एनआरसी निर्विवाद नहीं रहा है। इसमें खामियां भी रही हैं और विवाद भी। असम में यदि दोबारा एनआरसी को अमल में लाया जाना है तो फिर अब तक हुई कवायद का क्या होगा? इस पर लगे समय, श्रम और पैसे का क्या होगा? क्या देशभर के लोगों को भी इसी तरह के कटु अनुभवों से रूबरू होना पड़ेगा? इसलिए केंद्र सरकार को इसे पूरे देश में अमल करने से पहले इसकी व्यवहार्यता पर भी विचार करना चाहिए। जब मात्र 3.3 करोड़ लोगों के लिए एनआरसी लागू करने पर ऐसे कटु अनुभव सामने आ सकते हैं तो पूरे देश के 130 करोड़ लोगों के लिए अमल होने पर यह कहीं त्रासदी न बन जाए। यह सही है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा शासित हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत आधा दर्जन राज्यों के मुख्यमंत्री अपने-अपने राज्यों में एनआरसी लागू करने की मांग कर चुके हैं, लेकिन दूसरी ओर पश्चिम बंगाल और बिहार के मुख्यमंत्री एनआरसी के खिलाफ हैं। बिहार में तो भाजपा गठबंधन सरकार में है। ऐसे में केंद्र सरकार को एनआरसी को देशभर में अमल में लाने से पहले यह सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्दोष लोगों को अपने ही देश का नागरिक साबित करने में असम जैसे कटु अनुभवों से न गुजरना पड़े। कोई जायज नाम इससे छूट न जाए। इसके बाद ही सरकार को कोई पहल करनी चाहिए।


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