एक व्यक्ति में जीवन्त अनेकों व्यक्तित्व हम सबके बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा जी

05 सितम्बर पावन पुण्यतिथि पर विनम्र स्मरण विशेष  



पुराने भोपाल नबावी रियासत के दिनों के कुछ सौम्य, सभ्य, सुसंस्कृत, सदाचारी जुझारू लोगों के इतिहास का यदि स्मरण किया जाय तो पूज्य बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा का जिक्र निश्चित ही अग्रणी होगा। जैसा उनका नाम था वैसे ही कुछ विचित्र सी रही है बाबूजी की जीवन यात्रा। उनकी मंडली के सभी मित्र, उनके परिचित और अन्य उन्हें सम्मान सूचक शब्द बाबूजी से ही बुलाते थे। किसी भी वार्तालाप या सभा में यदि बाबूजी शब्द का उद्बोधन हुआ है तो सभी जन समझ जाते थे कि इस आत्मीय सम्बोधन के पात्र विचित्र कुमार सिन्हा जी ही हैं। यह व्यक्ति के व्यक्तित्व की ही विशेषता हो सकती है कि उससे परिचय की श्रंखला के सभी छोटे बड़े उसे एक विशेष सम्बोधन बाबूजी कह कर एक आत्मीय भाव का बोध करते  हों। बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा जी का जन्म 14 फरवरी 1924 को मध्य प्रदेश के गुना में हुआ था। उस समय देश परतन्त्रता की बेडिय़ों में अँग्रेजों की गुलामी के दौर में था।  बचपन से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी बाबूजी ने एक बार चर्चा के दौरान बताया कि करीब 15 वर्ष आयु वे अपने समकक्ष साथी मित्रों के साथ  आजादी के दीवानों की टोली  झंडा सत्याग्रह में शामिल हो गये थे और अँग्रेजी फौज द्वारा  प्रताडि़त किये गये। बस यहीं से एक और स्वतंत्रता संग्राम सैनानी का उद्गम हुआ। अनेकों बार स्वतंत्रता आंदोलनों में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करते हुए जेल गये। आक्रोश की इस जमीन से ही अपने भीतर की छटपटाहट को सम्प्रेषित करने के लिए एक निर्भीक पत्रकार, कलमकार, नाटककार, कहानीकार का जन्म बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा के रूप में हुआ। गुलामी के उस दौर अपनी बेचैनी और समाज को भीतर तक आजादी के मायने समझाने के लिए एक हस्त लिखित समाचार पत्र का सम्पादन करके भारत की नई तरुणाई में राष्ट्रप्रेम की अलख जगाने का साहसिक कार्य कई वर्षों तक किया। और एक दिन 15 अगस्त सन् 1947 को देश आजाद हुआ। आजादी के इस हवन में  बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा जी के द्वारा दी गई आहुतीयों की समिधा का भी एक विशेष योगदान रहा है। बाबूजी के जीवन से जुड़ी बहुत सी रोचक और अविस्मरणीय बातें वे स्वयं प्रतिवर्ष 14 फरवरी को अपने जन्मदिन के अवसर पर अपने निवास पर आयोजित एक पारिवारिक काव्य गोष्ठी में हम सब से साझा करते थे। इस काव्य गोष्ठी का संचालन वर्षों तक मेरे द्वारा किया जाता रहा। गोष्ठी की विशेषता यह थी कि उसमें प्रदेशभर कवि, रचनाकार सम्मलित होते थे, गोष्ठी पूरी रात बाबूजी के निवास पर चलती थी। सभी को भोजन भी बाबूजी के सानिध्य में करना अनिवार्य था। इस बीच हास परिहार, हँसी ठिठोली का वातावरण भी उस आयोजन की गरिमा को चार चाँद लगा देता था। उन चार चाँदों के उल्लास की अनुभूति में एक चाँद ऐसा भी था जिसके निश्छल अगाध प्रेम की परिधि में बंधा मैं भोर की पहली किरण के उद्गम के साथ आकाश में विलय होते हुए चाँद को निहारा करता था। आज पूज्य बाबूजी विचित्र कुमार सिन्हा जी की पुण्यतिथि के अवसर पर उन्हें स्मरण कर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

            ऋषि श्रृंगारी             (गीतकार)

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