एक भारत, श्रेष्ठ भारत

दिलीप सिंह क्षत्रिय

वैसे तो, पिछले पांच साल से हम एक भारत, श्रेष्ठ भारत का साद सुनते आ रहे हैं । केन्द्र सरकार के विविध कार्यक्रम से शूरू कर के विविध प्रवचनो में भी एक भारत, श्रेष्ठ भारत का सुर कान में गूंजता रहता है ।

आखिरकार देखा जाय तो हमारा देश एक है और श्रेष्ठ भी है यह कहने की जरूरत नहीं हैं । हरेक नागरिक को अपनें देश के लिए और देश श्रेष्ठ होने के लिए गौरव होना अत्यंत स्वाभाविक हैं और यह बात काश्मीर से शूरू कर के कन्याकुमारी तक और गुजरात के द्वारिका से शूरू कर के मणिपुर- मेघालय तक समग्र भारत के नागरिकों को लागु होती हैं। वैसे भी हमारी संस्कृति में वसुधैव कुटुम्बकम अर्थात्त समग्र विश्व एक परिवार होने की भावना हमारी बुनी हुई हैं, ओर हम यही संस्कृति में पले और बडे हुए हैं इसलिए ऐसी श्रेष्ठता की भावना और गौरव हम में बुना हुआ ही हैं । लेकिन, सवाल यह होता हैं कि केन्द्र सरकार को एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम का अमल किस लिये करना पडता हैं ? प्रथम यह बात स्पष्ट करनी चाहिए की एक भारत श्रेष्ठ भारत कोई सरकारी योजना नहीं हैं । यह एक कार्यक्रम हैं और निरंतर चलनेवाला एक भावनात्मक कार्यक्रम हैं । इसलिए उसके परिणाम को भी भावनात्मक द्रष्टि से देखना चाहिए । हम जानते हैं कि परिवर्तन संसार का नियम हैं और पिढी दर पिढी समाज के मूल्य रीतिरिवाज और परंपराओ में बदलाव आते रहते हैं । इस बदलाव के साथ संस्कृति के ऐसे चिरंतन मूल्यों को साबुत रखने के लिए और उसको ज्यादा मजबूत बनाने के लिए इस प्रकार के कार्यक्रम आवश्यक बन जाते हैं । इस अर्थ में एक भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम और इसके पिछे जो भावनात्मक अभिगम हैं वह आवकार्य हैं ।

ईतनी पश्चाद्दभूमिका देने के बाद अब हम एक, भारत श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम क्या हैं यह समजनें का प्रयास करेंगे ।

क्या हैं यह कार्यक्रम ?

हम सब जानते हैं कि भारत व्यापक भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषाकिय वैविध्यता प्राप्त देश हैं । विविधता में ऐकता कि अनोखी मिसाल रखनेवाला यह देश उसके ईर्दगिर्द बुने हुए ताना-बाना की वजह से ही हरेक संकट के बाद मजबूत बन के उभर आया हैं ।

वर्तमान समय में टेकनोलोजी ने जब भौगोलिक अंतर शून्य कर दिया हैं तब विविध राज्य के लोगों की परस्पर की समज और विश्वास में वृध्धि कर के भारत की यह सांस्कृतिक एकता की बुनियाद मजबूत बनाने का कार्यक्रम अर्थात्त एक भारत, श्रेष्ठ भारत । सोचिए कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र से कोई व्यक्ति यदि गुजरात में आता हैं ओर कन्याकुमारी की कोई व्यक्ति यदि काश्मीर जाती हैं तो उसको पराये मुल्क में आ गया हो ऐसी भावना न हो और अपना ही देश है ऐसा लगे वह भी जरूरी है ना ? बस, ऐसी भावना को मजबूत करने का उद्देश अर्थात्त एक भारत, श्रेष्ठ भारत कार्यक्रम ।

मूलत: ऐसे ही विचार को कार्यक्रम के स्वरूप में अमल में लाने के लिए और मजबूती के साथे आगे बढाने का प्रारंभ कर के प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदीने 31 अकटूबर, 2015 को भारत की राष्ट्रिय ऐकता के प्रतिक समान लोह पुरूष सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्म दिन पर यह कार्यक्रम का प्रारंभ किया था । भारत का सांस्कृतिक वैविध्य अखंड बना रहे और साथ साथ दो भिन्न भिन्न सांस्कृतिके लोगों के बीच परस्पर आदान-प्रदान बढे वही इस कार्यक्रम का बुनियादी विचार और आधार है ।

इस कार्यक्रम प्रारंभिक योजना अनुसार भारत के तमाम राज्यमें से निश्चित समय के लिए दो दो राज्य की जोडी बनाई गई थी । यह जोडी के राज्य निर्धारित कार्यक्रम अनुसार भाषा, साहित्य, आहार- विहार, त्यौहार, प्रवासन और संस्कृति संबंधित अनेक कार्यक्रम परस्पर के राज्यमें आयोजित करें ऐसा तय किया गया है । इसके द्वारा दोनों राज्यों के लोगों को परस्पर की संस्कृति से ज्यादा परिचित करना और दोनों राज्यों के बीच आदान-प्रदान बढानें को उद्देश था ।

एक भारत, श्रेष्ठ भारत के मूलभूत उद्देश:

1.अपने देश की विविधता में एकता की संस्कृति का उत्सव मनाना और इसके माध्यम से देश के लोगों के बीच परस्पर भावनात्मक संबंध और मजबूत करना ।

2.राष्ट्रीय एकता के विचार को आगे बढाना । राज्यों के परस्पर संबंध मजबूत बनाकर राष्ट्रीय एकता के विचार को और मजबूत करना ।

3.अपनी समृध्ध विरासत रिती-रिवाज और परंपराओं को लोगों की समक्ष रखकर उसमें से जो सामान्य हो उसको उजागर करके उसके माध्यम से राष्ट्रीय एकता की पहचान मजबूत करना ।

4.विविध राज्यों के बीच परस्पर आदान-प्रदान के माध्यम से परस्पर की अच्छी बातों को स्विकार करना और नये कल्चर को बढावा देना ।

राज्यों की जोडी:

एक भारत, श्रेष्ठ भारत अंतर्गत जून 2020 तक जिस राज्यों की जोडी बनाई गई थी उसमें जम्मु-काश्मीर और तामिल नाडु, पंजाब और आंध्र प्रदेश, हिमाचल और केराला, उत्तराखंड और कर्णाटक, हरियाणा और तेलंगणा, गुजरात और छत्तीसगढ, महाराष्ट्र और ओरिस्सा, गोवा और झारखंड, दिल्ही और सिक्कीम, मध्य प्रदेश और मणिपुर, उत्तर प्रदेश और अरूणाचल प्रदेश, बिहार और त्रिपूरा, चंदीगढ और दादरा नगर हवेली, पुडुचेरी और दमण और दीव, लक्षदीप और आदामान निकोबार । इस तरह से जोडी बनाई गई थी ।

अब किसी को सवाल होगा की राज्य की जोडी बनाने के बाद इसमें क्या प्रवृत्ति करनी होगी ?

ऐसे तो, इस कार्यक्रम के अंतर्गत भाषा, साहित्य, आहार- विहार और संस्कृतिकी अन्य भिन्न प्रकार की प्रवृत्ति के लिए अवकाश है । फिर भी हम गुजरात और छत्तीसगढ की जोडी के संबंध में यह कार्यक्रम की प्रवृत्तिओं को समजने के लिए प्रयास करेंगे ।

जैसे की हरेक प्रदेश का साहित्य भिन्न प्रकार का होता है, क्युं की साहित्य में उस प्रदेश की संस्कृति और रीति-रिवाज का धबकार होता है । दो प्रदेश को निकट लाने के लिए साहित्य अत्यंत उत्तम माध्यम है । इस कार्यक्रम के अंतर्गत दोनो राज्य अपने अपने साहित्य के पांच श्रेष्ठ पुस्तक का परस्पर की भाषा में अनुवाद करे और अपनी भाषा के पांच श्रेष्ठ गीत की परस्पर की भाषा में अनुवाद करके स्वरबध्ध करें ऐसा एक उद्देश भी है । गुजराती भाषा की कृति छत्तीसगढ की भाषा में अनुवादित हो और वहां की कृतिओं का गुजराती में अनुवाद हो ऐसा ख्याल है ।

दोनों प्रदेश की भाषाकी कहावतें और मुहावरो में जो समान शब्द हो उसका अलग से चयन कर के एक नया कोष भी तैयार हो सकता है और दोनों प्रदेश को निकट लाने में सहायक बन सकता है ।

दोनो प्रदेश के बीच परस्पर की संस्कृति के आदान-प्रदान के कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित करने चाहिए । उदाहरण के तौर पर गुजरात की भिन्न रंगी संस्कृति को उजागर करने के लिए गरबा और नृत्य से शूरू करके अन्य कार्यक्रमो का आयोजन छत्तीसगढ में कर सकते है और छत्तीरगढ के कलाकार गुजरात आ कर कार्यक्रम रजू करेंगे तो परस्पर की कला और संस्कृति से परिचित होंगे ।

समान प्रकार से गुजरात और छत्तीसगढ की हस्तकला से शुरू कर के भिन्न रंगी सांस्कृतिक कृतिओ और बनावट परस्पर के प्रदेश में जायेगी तो कलाकार और कसबी को प्रोत्साहन मिलेगा।

दोनों राज्यों की युनिवर्सिटी परस्पर के सहयोग से शैक्षणिक प्रवास और सेमिनार का आयोजन करेगी तो दोनों राज्यों की शैक्षणिक परम्परा से विद्यार्थी परिचित होंगे और वैचारिक आदान-प्रदान बढेगा । स्कूल और कोलेज के अभ्यास क्रम में दोनों राज्यो की भाषाओ का नियत साहित्य को समाविष्ट किया जाएगा तो परस्परकी निकटता बढेगी ।

गुजरात के लोग छत्तीसगढ में जाकर होटल में रूकने के अलावा स्थानिक लोगों के घरमें रहेंगे ओर छत्तीसगढ के लोग गुजरात आकर गुजराती के घर में रहेंगे तो स्वाभाविक रूप से गृह निवास की नयी संस्कृति से लोग परस्पर की निवास प्रणालि से परिचित होंगे और संबंध ज्यादा मजबूत बनेगा ।

ब्लोग, फोटोग्राफी, कवीझ जैसे अनेक माध्यम से स्पर्धाओं का आयोजन करने से दोनों राज्यों अपनी संस्कृति की समान बाबतों को बहार लाकर परस्पर की निवास प्रणालि और परम्पराओं से परिचित होंगे ।

इस कार्यक्रम के अंतर्गत जो दो राज्य की जोडी बनाई गई हो वह दोनों राज्य परस्पर शैक्षणिक और सांस्कृतिक प्रवास का नियमित रूप से आयोजन करे ऐसा उद्देश भी रखा गया है ।

केन्द्र सरकार ने इस कार्यक्रम के अंतर्गत केन्द्र सरकार के उच्च शिक्षण विभाग, स्कूल एज्युकेशन विभाग, खेल- कूद विभाग, सांस्कृतिक मंत्रालय, प्रवासन मंत्रालय, संरक्षण मंत्रालय, रेलवे और माहिती प्रसारण मंत्रालय और संसदिय बाबत का मंत्रालय के अनेक विभाग को इस कार्यक्रम के अंतर्गत सामिल किये गये है और इस से समग्र कार्यक्रम के अमल में एक संवादिता का रखरखाव होगा ।

(लेखक गुजरात के जाने माने पत्रकार हैं)

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