एकीकृत कमान

हाल ही में सेवानिवृत्त हुए जनरल बिपिन रावत को पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के रूप में नियुक्त किये जाने से देश की मौजूदा रक्षा चुनौतियों का बेहतर ढंग से मुकाबला हो सकेगा। इसमें दो राय नहीं कि सेना की जरूरतों और व्यवस्थाओं के निर्धारण में सेना का अनुभवी व्यक्ति ही कारगर भूमिका निभा सकता है। इस नियुक्ति से देश की थलसेना, नौसेना और वायुसेना के कामकाज में सामंजस्य बनेगा और सैन्य ताकत को मजबूती मिलेगी। इस पद के सृजन के बाद सीडीएस की सेवा अवधि तथा सैन्य मामलों का नया विभाग बनाकर इसके लक्ष्यों को हासिल करने की कोशिश की गई है। सेना प्रमुख के रूप में सीमाओं पर महत्वपूर्ण दायित्व निभा चुके जनरल बिपिन रावत का लंबा अनुभव सीडीएस के दायित्वों के निर्वहन में काम आयेगा। सेवानिवृत्ति की सीमा बढ़ाने के बाद वे तीन साल तक काम कर सकेंगे। दरअसल, इस पद के सृजन की मांग लंबे समय से की जाती रही है। पूर्व कैबिनेट सचिव नरेश चंद्र की अध्यक्षता वाली समिति ने 1990 में इसकी जरूरत पर बल दिया है। बीते पंद्रह अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस पद के सृजन के संकेत दिये थे। फिर पिछले दिनों सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने सीडीएस पद बनाये जाने की मंजूरी दे दी। जाहिर है इस कदम से प्रतिरक्षा के नजरिये से रक्षा सेवाओं की समन्वित कार्रवाई को मजबूती मिल सकेगी। जहां सेनाओं के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में तेजी आयेगी, वहीं तीनों सेनाओं की रक्षा आवश्यकताओं का समय से निस्तारण किया जा सकेगा। इसमें दो राय नहीं कि केंद्र सरकार के इस कदम से बड़े बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाया गया है, जो नि:संदेह देशहित में जरूरी कदम कहा जा सकता है, जिसका लाभ प्रतिरक्षा मोर्चे पर लक्ष्यों को हासिल करने में मिल सकेगा।

जहां सीडीएस थल, जल व वायुसेना से जुड़े मसलों के लिये रक्षामंत्री के सैन्य परामर्शक के रूप में कार्य करेंगे, वहीं देश के प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी (एनसीए) के सैन्य सलाहकार भी होंगे। लेकिन इसके बावजूद तीनों सेना प्रमुखों के अधिकारों का अतिक्रमण नहीं होगा, उनकी स्थिति यथावत बनी रहेगी। वे रक्षा मंत्री को पहले की तरह रिपोर्ट करते रहेंगे। यानी इस पद के निर्धारण में शाक्ति व संतुलन को प्राथमिकता दी गई है। दरअसल, कारगिल युद्ध ने देश को कई तरह के सबक दिये थे। तब कहा भी गया था कि यदि सेना के अंगों में बेहतर तालमेल होता तो थलसेना को कम क्षति उठानी पड़ती। नि:संदेह आज युद्ध का परंपरागत स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। अब युद्ध जमीन पर ही नहीं, आकाश में अत्याधुनिक तकनीकों के जरिये लड़ा जाता है। यही वजह है कि बड़ी शक्तियों ने सैनिकों की संख्या में कटौती के साथ ही सीडीएस जैसे पदों का सृजन करके आधुनिक चुनौतियों का मुकाबला करने का मन बनाया है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सेना के तीनों अंगों में बेहतर तालमेल हो। जाहिरा तौर पर इस नियुक्ति से सेनाओं से जुड़ी समस्याओं का निर्धारण तीव्र गति से हो पायेगा और सरकार व सेनाओं की बीच संवाद की प्रक्रिया बेहतर हो पायेगी। खासकर सेना के अनुभवी अधिकारी की नियुक्ति से आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को भी तेज करने में मदद मिल सकेगी। इससे बदलते वक्त के साथ सेना की नई जरूरतों के लिये फैसले समय पर लिये जा सकेंगे। कारगिल युद्ध के दौरान सेना की जरूरत के सामान आनन-फानन में महंगे दामों में खरीदे गये थे और उनकी खरीद से जुड़े विवाद भी सामने आये थे। नि:संदेह योजनाबद्ध तरीके से लक्षित युद्ध शीघ्र कामयाबी की इबारत लिख देते हैं। इसी कड़ी में सैन्य मामलों का पांचवां विभाग बनाया जाने से विशिष्ट खरीद, संयुक्त योजनाओं, आवश्यकताओं के एकीकरण के जरिये सैन्य सेवाओं की खरीद, प्रशिक्षण व नियुक्ति प्रक्रिया में बेहतर तालमेल स्थापित हो सकेगा।

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