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उपचुनाव योगी सरकार की अग्निपरीक्षा

हरीश लखेड़ा

उत्तर प्रदेश में 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। लोकसभा की चुनावी जंग के बाद प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा समेत सभी दलों को विधानसभा की एक दर्जन खाली सीटों के उपचुनाव में कूदना है। विधायकों के लोकसभा के लिए चुने जाने के बाद ये सीटें खाली हुई हैं। ये उपचुनाव प्रदेश की योगी सरकार समेत सभी दलों के लिए वास्तव में ढाई साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव का लिटमस पेपर टेस्ट हैं। इनसे जनता का मूड भांपने में मदद मिलेगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ इसकी तैयारी में जुट गए हैं। इसी के चलते उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया। सत्ता में आने के बाद उनके मंत्रिमंडल का यह पहला विस्तार है। इस कवायद में वे उत्तर प्रदेश की राजनीति के मुख्य आधार जाति को छोडऩे की हिम्मत नहीं कर पाए। मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में योग्यता को तवज्जो देने की बजाय जातीय और क्षेत्रीयता का संतुलन कायम करने की कोशिश की। इसलिए उनके मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों की योग्यता से ज्यादा इस बात की चर्चा हुई कि किस जाति और क्षेत्र के कितने नेताओं को शामिल किया गया। योगी मंत्रिमंडल में 6 कैबिनेट, 6 राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और 11 राज्य मंत्री शामिल किए गए। इस तरह अब प्रदेश में मंत्रियों की कुल संख्या 56 हो गई है। इन 23 मंत्रियों में सबसे ज्यादा 10 पिछड़ों व दलितों को मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी दी गई। मंत्रियों में 6 ब्राह्मण, 3 वैश्य, 3 दलित, 2 क्षत्रिय, 2 जाट, 2 कुर्मी, 1 गुर्जर 1 राजभर, 1 गड़रिया, 1 शाक्य और 1 मल्लाह हैं। इनमें 18 चेहरे नए हैं। मुख्यमंत्री योगी भी जानते हैं कि 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद से मोदी लहर से ही भाजपा अब तक के अधिकतर चुनाव जीतती रही है। वर्ष 2019 के चुनाव में भी मोदी लहर से ही भाजपा केंद्र में दोबारा लौटी, लेकिन प्रदेशों में भाजपा को अब अपने दम पर ही सत्ता में लौटना है। मोदी की लोकप्रियता कायम रहने के बावजूद 2018 में भाजपा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारों को गंवा चुकी है। इसलिए मुख्यमंत्री योगी को अब चुनाव खुद के दम पर जीतना बड़ी चुनौती है। प्रदेश में योगी सरकार का दावा रहा है कि वह अपराधियों के खिलाफ सख्त रही है, लेकिन उसके इस दावे की पोल उन्नाव रेप कांड और सोनभद्र गोली कांड ने खोल दी है। उन्नाव रेप मामले में भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर मुख्य आरोपी है। सेंगर के खिलाफ पार्टी ने कार्रवाई करने में भी देरी की। इससे संदेश गया कि योगी सरकार अंत तक सेंगर को बचाने की कोशिश करती रही। इसी तरह प्रदेश के सोनभद्र जिले में जमीनी विवाद में 3 महिलाओं समेत 9 लोगों की हत्या से कानून और व्यवस्था को लेकर योगी सरकार पर सवाल खड़े हो गए। हालांकि, मुख्यमंत्री योगी कहते रहे हैं कि सोनभद्र गोलीकांड के मुख्य अभियुक्त का संबंध सपा से है जबकि उसका भाई बसपा से जुड़ा है। चुनाव में यह मुद्दा भाजपा की दुखती रग साबित हो सकता है। भाजपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 312 सीटें जीतकर तीन-चौथाई बहुमत प्राप्त किया जबकि तबके सत्तारूढ़ सपा गठबंधन को 54 और बसपा को 19 सीटों से संतोष करना पड़ा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता तथा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कुशल चुनावी रणनीति के चलते भाजपा को 2017 में यह विजय मिली। बहरहाल, प्रदेश की 12 विधानसभा सीटों के लिए होने जा रहे उपचुनाव योगी सरकार के लिए सेमीफाइनल जैसे हैं। योगी मंत्रिमंडल का विस्तार हो चुका है और अब वे लोकलुभावनी घोषणाएं करने में जुटेंगे। योगी सरकार और भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि लोकसभा चुनाव के समय बना सपा और बसपा का महागठबंधन अब टूट चुका है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव के संबंध भी अभी खास सुधरे नहीं हैं। हालांकि, शिवपाल यादव की प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने विधानसभा के उपचुनाव में अपने प्रत्याशी नहीं उतारने का ऐलान किया है। इससे सपा को उम्मीद है कि उसका वोट अब दो दलों में नहीं बिखरेगा। बसपा ने भी उपचुनाव लडऩे की तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि, मायावती के लिए परेशानी यह है कि उनके भाई आनंद कुमार आय से ज्यादा संपत्ति के मामले में आरोपी हैं। आनंद कुमार मायावती के भाई ही नहीं, बल्कि बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हैं। मायावती अब आनंद कुमार के पुत्र आकाश को अपना उत्तराधिकारी बनाने के लिए बसपा का राष्ट्रीय संयोजक भी बना चुकी है। इससे चुनाव के समय जवाब देने में मुश्किल हो सकती है। इसके अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आजाद रावण की भीम आर्मी के उदय के कारण भी बसपा के जनाधार को सेंध लगनी शुरू हो गई है। वैसे भी बसपा और सपा के वोट बैंक में भाजपा पहले भी भारी सेंध लगा चुकी है। प्रदेश में कांग्रेस भी मृतप्राय: है। लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद प्रदेश में सभी जिला कमेटियां भंग कर दी गई थीं, जिनका पुनर्गठन तक नहीं हो पाया है। अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भी अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों तक सीमित है। निश्चय ही उपचुनाव योगी सरकार की अग्नि परीक्षा भी हैं। जबकि बसपा, सपा, कांग्रेस व रालोद के लिए संजीवनी भी साबित हो सकते हैं।




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