उत्पादन क्षेत्र में तेजी सुधारेगी आर्थिकी

जयश्री सेनगुप्ता


देश की अर्थव्यवस्था के सामने आज जो गंभीर समस्याएं मुंह बाए खड़ी हैं, लगता है उनको सुलझाने में सरकार को जल्दी नहीं है। विश्व बैंक ने वर्ष 2020-21 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर घटाकर 5 प्रतिशत के आसपास रहने का अनुमान लगाया है। सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी विभाग ने भी मौजूदा वित्तीय वर्ष की संभावित वृद्धि दर को 5 प्रतिशत ही बताया है, जो कि पिछले 11 सालों में सबसे कम होगी। लेकिन सरकार है कि उसके पास मगर मंद गति से उबरने की कोई ठोस योजना दिखाई नहीं दे रही है।

पिछले कुछ सालों से यह उपभोक्ता की मांग ही थी जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गतिमान पहियों का काम कर रही थी। परंतु अचानक एक साल से कुछ अधिक वक्त से हम इनको थमा हुआ देख रहे हैं। यह सरकार द्वारा किया जाने वाला खर्च है जो फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था को चला रहा है। आखिर उपभोक्ता ने यकायक अपने खर्चों को क्यूं रोक लिया? यहां तक कि पिछले दिनों त्योहारों पर भारी भरकम रियायतों की घोषणाओं के बावजूद बिक्री अपेक्षा के मुताबिक नहीं रही है। भविष्य कैसा होगा, इसकी झलक दिख रही है। जब अर्थव्यवस्था में तेजी हो और साथ ही बेरोजगारी दर कम हो तो ऐसे में उपभोक्ता का आत्मविश्वास बढ़ता है और लोग खुशी से खुद पर और अपने परिवार के लिए खरीदारी करते हैं।

उपभोक्ता-विश्वास पर कई सर्वेक्षण हुए हैं। इनमें एक, भारतीय अर्थव्यस्था निगरानी केंद्र नामक संस्था के अनुसार पिछले महीनों में लोग खरीदारी पर खर्च करने को इच्छुक नहीं हैं। अधिकांश लोगों को खुद पर आश्रित बुजुर्गों या बेरोजगार पारिवारिक सदस्यों की जिम्मेवारी भी उठानी होती है। फिर उन्हें बच्चों की स्कूली और ट्यूशन फीस की चिंता सताती है, तिस पर निजी स्कूलों की फीस में लगातार बढ़ोतरी होती जा रही है। लोगों को गंभीर बीमारी की दशा में इलाज के महंगेपन की चिंता भी सालती है। उन्हें यह भी डर है कि यदि भविष्य में आमदनी स्रोत के प्रवाह में कमी हुई तो वे अपना मौजूदा जीवनस्तर कायम नहीं रख पाएंगे, लिहाजा उन्होंने अपने तमाम गैरजरूरी खर्चों को रोक रखा है, मसलन नई कार या वाशिंग मशीन इत्यादि लेना। ऊपर से बढ़ती मुद्रास्फीति का स्तर बना हुआ है, पिछले महीनों में सब्जी इत्यादि रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू गए हैं।

वहीं निवेशकों ने अपना नया निवेश रोक रखा है क्योंकि वे पहले ही कम मांग की वजह से अनबिके माल के ढेर की समस्या से जूझ रहे हैं, ऊपर से जब उन्हें आगे उपभोक्ता की मांग में बढ़ोतरी होने की आस नजर नहीं आती तो जाहिर है वे उत्पादन के विस्तार को रोकेंगे ही। यह कम होता निवेश–आमदनी–मांग है जो आज भारतीय अर्थव्यवस्था के परिदृश्य पर हावी है। लोगों को आमदनी चाहिए। अगर उत्पादन क्षेत्र में वृद्धि दर ऊंची हो तो ज्यादा लोगों को कारखानों में रोजगार मिलेगा। दुर्भाग्यवश उत्पादन क्षेत्र अधोगति की ओर है और अक्तूबर-नवम्बर (2019) माह में उत्पादन दर में 3.8 प्रतिशत की गिरावट हुई है। केंद्रीय सांख्यिकी संस्थान के मुताबिक उत्पादन क्षेत्र की वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2019-20 में गिरकर 2 प्रतिशत रह जाएगी जो कि पिछले साल 6.9 फीसदी थी। यह स्पष्ट संकेत है कि उत्पादन क्षेत्र अब आर्थिक वृद्धि का अगुआ नहीं रह गया है। सरकार का ‘मेक-इन-इंडिया’ कार्यक्रम भी अपेक्षा के अनुरूप चल नहीं पाया है और यही मुख्य वजह है कि उत्पादन क्षेत्र का विकास एक जगह आकर स्थिर हो गया है। हालांकि उक्त कार्यक्रम के अंतर्गत यह वादा किया गया था कि उत्पादन क्षेत्र में विदेशी निवेशकों को विशेष आर्थिक छूटें, कम लालफीताशाही, बौद्धिक संपदा अधिकार की सुरक्षा, युवा कार्मिक बल, सस्ते वेतनमान और देश के विशाल बाजार का लाभ मिलेगा। बेशक कई बड़े नाम जैसे कि ‘एप्पल’ और ‘शियाओमी’ ने भारत स्थित अपने कारखानों में उत्पादन बढ़ाया है और ‘सैमसंग’ ने विश्व का सबसे बड़ा मोबाइल फोन उत्पादन कारखाना नई दिल्ली के पास लगाया है (हालांकि कलपुर्जे आयात होते हैं)। वर्ष 2015 में घोषित किए गए वैश्विक ‘ग्रीनफील्ड निवेश’ का बड़ा हिस्सा भारत को मिला था (‘ग्रीनफील्ड निवेश’ उसे कहते हैं जो काम मुहैया करवाने वाली या विस्तार करने वाली इकाइयों को या फिर उत्पादन क्षेत्र को दिया जाता है और निवेशकों को इसके वापिस आने की पूरी आस होती है), ‘फाइनेंशियल टाइम्स’ के आंकड़ों के मुताबिक भारत को उस साल इस मद में 60 बिलियन डॉलर मिले थे। इसके बाद दो वर्ष बाद हालात यह बने कि 2018 में जहां चीन को 107 बिलियन डॉलर तो भारत को 55 बिलियन डॉलर का ग्रीनफील्ड निवेश मिल पाया था। वर्ष 2019 आते स्थिति यहां आन पहुंची कि मार्च माह तक उत्पादन क्षेत्र में परोक्ष विदेशी निवेश घटकर महज 8 बिलियन डॉलर हुआ था।

निवेश मेें कमी की वजह से ‘मेक-इन-इंडिया’ कार्यक्रम चल नहीं पाया है। यह आश्चर्यजनक है कि क्योंकि पिछले वर्षों की तुलना में विश्व बैंक के ‘व्यापार करने में आसानी’ सूचकांक में भारत अपनी स्थिति सुधारते हुए पायदान चढक़र 63वें स्थान पर पहुंचा है। फिर ऐसा क्यों है कि भारत में विएतनाम और बांग्लादेश के स्तर की उत्पादन वृद्धि दर नहीं बन पाई है? इसका मुख्य कारण बुनियादी ढांचे में कमी है, मसलन सडक़ें, बिजली उपलब्धता और जमीन अधिग्रहण की धीमी गति और कड़े श्रम कानून। वहीं हमारे पड़ोसी देशों में वेतनमान कहीं कम तो उत्पादन दर कहीं अधिक है। भारत कभी परोक्ष विदेशी निवेशकों के पसंदीदा गंतव्य होने का खुद पर गर्व किया करता था, अब वह जाता रहा है। जिस तरह रोज-ब-रोज नई राजनीतिक समस्याएं पैदा हो रही हैं, उसके मद्देनजर अधिकांश विदेशी निवेशक और ज्यादा हतोत्साहित होंगे।

इसके अलावा सकल घरेलू उत्पाद में उत्पादन क्षेत्र का योगदान तय किए गए 25 प्रतिशत के लक्ष्य की बजाय 15 फीसदी रहा है । भारत सरकार ने ग्रामीण अंचल में गरीबों को प्रतिवर्ष 6000 रुपये की आर्थिक सहायता देनी शुरू की है लेकिन इससे बाजार-मांग में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं हो पाएगी। अगर ‘मेक-इन-इंडिया’ ठीक ढंग से चल निकला होता तो गांवों में अनेक खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां, जैम-अचार बनाने वाले धंधों के अलावा हल्के उद्योग भी स्थापित हो सकते थे, जहां ग्रामीण स्त्री-पुरुषों को नौकरियां मिल सकती थीं।

जब आर्थिकी में तेजी से बढ़ोतरी होगी तभी तो लोगबाग भी अपनी नौकरियों के स्थायित्व और आमदनी को लेकर कुछ निश्चिंत होंगे और खर्च करने लगेंगे, अतएव उच्च सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर पाने में असल चाबी उत्पादन क्षेत्र के हाथ में है। हो सकता है वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण आगामी बजट में आयकर में कमी करके औसत उपभोक्ता को राहत पहुंचाएं। इससे मदद मिल भी सकती है और नहीं भी। कॉर्पोरेट करों में की गई हालिया कटौती के बावजूद उद्योगपतियों के बीच वैसी ‘उत्साह भावना’ नहीं पैदा हो पाई है जिसकी उम्मीद थी। सुचारु बुनियादी ढांचे के जरिए उत्पादन क्षेत्र में बदलाव और कर्मियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई जा सकती है। आधारभूत तंत्र पर खर्च बढ़ाकर सरकार इस ओर बड़ी सहायता कर सकती है। भले ही आर्थिक घाटा कम करने का ध्येय प्राप्त न हो सके लेकिन जिस तरह के मौजूदा हालात हैं, ऐसे समय में यदि सरकार इस मद में ज्यादा खर्च करे तो यह कतई बेजा नहीं होगा।

0 views0 comments