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इस जंग में टीम इंडिया की भावना जरूरी

राजकुमार सिंह


कोरोना नामक अभूतपूर्व महामारी है तो विश्वव्यापी संकट, लेकिन इसने भारतीय समाज और सरकारी तंत्र, दोनों की ही कमजोरियों को बेनकाब कर दिया है। सामान्य समझ भी कहती है कि संकटकाल में कमजोरियां गिनाने के बजाय उन्हें दूर करने पर फोकस रहना चाहिए, पर दूर करने से पहले कमजोरियों की पहचान-अहसास होना भी जरूरी है। 22 मार्च को जनता कर्फ्यू और फिर 25 मार्च से लॉकडाउन को लगभग तीन महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन कोई दावे से नहीं कह सकता कि इन कवायदों से घोषित-वांछित लक्ष्य हासिल हो पाये हैं। रविवार को एक दिन के जनता कर्फ्यू का घोषित मकसद यही था कि कोरोना का संक्रमण रोकने में मदद मिलेगी। 25 मार्च से 21 दिन के लॉकडाउन का तर्क भी यही था कि इससे कोरोना संक्रमण की चेन टूट जायेगी। बाद में यह लॉकडाउन 31 मई तक बढ़ता गया। सच तो यह है कि अनलॉक की प्रक्रिया के बीच भी लॉकडाउन किसी न किसी रूप में जारी ही है, लेकिन कोरोना संक्रमण की चेन है कि टूटने के बजाय दिनोंदिन भयावह रूप से मजबूत-अटूट बनती जा रही है।

इतने लंबे लॉकडाउन के बावजूद कोरोना पर नियंत्रण में कामयाबी क्यों नहीं मिली—इस स्वाभाविक सवाल का जवाब कोई नहीं देना चाहता। हां, सरकारी सूत्र और एजेंसियां आंकड़ों की बाजीगरी के जरिये यह अवश्य साबित करना चाहती हैं कि लॉकडाउन से संक्रमण की रफ्तार थामने और कोरोना से लंबी चलने वाली लड़ाई की व्यापक तैयारियों के लिए समय मिल गया। दरअसल यह दावा अर्धसत्य ही है। लॉकडाउन के 21 दिन के पहले चरण की बाबत तो संक्रमण की रफ्तार थामने की बात किसी हद तक सही भी है, लेकिन उसके बाद देश भर के तमाम हिस्सों में प्रवासी मजदूरों के पलायन समेत अफरा-तफरी का जैसा माहौल दिखा, वह सच बयान करने के लिए काफी है। हालांकि कभी मध्य प्रदेश में सरकार गिराने में व्यस्तता के चलते लॉकडाउन में विलंब का आरोप लगाने वाली कांग्रेस अब प्रवासी मजदूरों को उनके मूल निवास को भेजे बिना लॉकडाउन को जल्दबाजी में उठाया गया कदम बता कर खुद ही विरोधाभासी बयानबाजी कर रही है, लेकिन संक्रमण के आंकड़े भी यही संकेत दे रहे हैं कि लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों के पलायन और उन्हें भेजे जाने के सरकारी प्रयासों के बजाय पहले ही ऐसा करना हर दृष्टि से बेहतर होता। लॉकडाउन से पहले कोरोना के पॉजिटिव केस गिनती भर थे, जबकि तीसरे-चौथे चरण में हजारों में तो अनलॉक की प्रक्रिया के बीच अब तीन लाख से भी ऊपर पहुंच गये हैं।

जाहिर है, सरकार से कोरोना संकट के आकलन में चूक हुई। यह अस्वाभाविक भी नहीं मानी जा सकती। यह अभूतपूर्व संकट था, जिसका आकलन करने के लिए राजनीतिक नेतृत्व पूरी तरह चिकित्सा विशेषज्ञों की समझ और सलाह पर निर्भर रहा। क्योंकि मौजूदा आबादी की स्मृति में ऐसा महामारी संकट था ही नहीं, इसलिए ये विशेषज्ञ भी उपलब्ध अध्ययनों और दूसरे देशों के अनुभवों पर ही निर्भर रहे होंगे। मास्क के इस्तेमाल को लेकर ही इन विशेषज्ञों की सलाह जिस तरह बार-बार बदलती रही, उससे भी वास्तविकता का पता चल ही जाता है। इसके बावजूद कोरोना से जंग में वियतनाम, दक्षिण कोरिया और न्यूजीलैंड सरीखे देशों का बेहतर प्रदर्शन बताता है कि समय रहते जरूरी कदम उठा कर भारत इस महामारी की मार से बचने में ज्यादा सफल हो सकता था। हमारी सरकार 30 जनवरी को भारत में पहला कोरोना केस आने के बाद से ही एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग सरीखे कदम उठाने का दावा कर रही है, जिस पर स्पेन समेत संक्रमित देशों के पर्यटकों तथा बड़ी संख्या में संक्रमित प्रवासी भारतीयों का आ जाना सवालिया निशान लगाने के लिए काफी है। यह स्वाभाविक सवाल भी अनुत्तरित ही है कि हम अपने देश में पहला कोरोना केस आने का इंतजार क्यों करते रहे? वियतनाम और दक्षिण कोरिया की तरह हमने विदेशों में कोरोना संक्रमण के साथ ही हवाई और समुद्री यात्राओं को प्रतिबंधित नहीं तो नियंत्रित क्यों नहीं किया?

कटु सत्य यही है कि बिना सुविचारित दीर्घकालीन रणनीति बनाये सिर्फ लॉकडाउन को रामबाण मान लेने से कोरोना संक्रमण पर नियंत्रण में वांछित सफलता नहीं मिल पायी। बेशक ऐसे अभूतपूर्व संकट के लिए न तो हमारा सरकारी तंत्र तैयार था और न ही समाज। लॉकडाउन को धता बताकर जिस तरह पढ़े-लिखे युवा भी मौज-मस्ती के लिए सडक़ों पर नजर आये, वह ऐसे संकट के मद्देनजर किसी सजग समाज की निशानी तो हरगिज नहीं है। कोरोना संकट ने भारतीय स्वास्थ्य तंत्र की भी कलई खोल कर रख दी है। दुनिया की महाशक्ति बन सकने के सपने दिखाये जाते हैं, पर हकीकत यह है कि दूरदराज तो छोडि़ए, देश की राजधानी दिल्ली और वाणिज्यिक राजधानी मुंबई तक में कोरोना सरीखी महामारी के वक्त इलाज के लिए अस्पतालों में जरूरी बेड, आईसीयू और वेंटिलेटर तक उपलब्ध नहीं हैं। सरकारी छूट और सुविधाओं से ही हैल्थ केअर के नाम पर पनपे निजी क्षेत्र ने चिकित्सा को भी किस तरह बेरहम व्यापार बना दिया है, कोरोना काल में इसका भी खुलासा हो गया। इस शर्मनाक सच ने राजनीतिक पहचान से इतर स्वतंत्र भारत के राजनीतिक नेतृत्व और शासन तंत्र की संवेदनशीलता और विकास प्राथमिकताओं पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। इस सच को स्वीकार करने का साहस अभी तक हमारे राजनीतिक नेतृत्व और शासन तंत्र ने नहीं दिखाया है कि बेलगाम आबादी हर समस्या की तरह कोरोना संकट को भी भयावह बनाने में बड़ा कारक साबित हो रही है। यह हमारे संपूर्ण राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की सामूहिक विफलता है, जो देश के प्रति अपराध से कम गंभीर नहीं । जाहिर है, समय के चक्र को उलटा नहीं घुमाया जा सकता, लेकिन ऐसी गलतियों से सबक अवश्य सीखे जाने चाहिए, पर हम उसके लिए भी तैयार नहीं दिखते। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच दलगत राजनीति के आधार पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल तो लॉकडाउन के दौरान ही शुरू हो गया था, अनलॉक प्रक्रिया में वह और भी खुल कर सामने आ गया है।

यह सही है कि स्वास्थ्य मूलत: राज्य के अधिकार क्षेत्र का मामला है, पर संकटकाल में तो केंद्र-राज्य सरकार को एक-दूसरे पर दोषारोपण के बजाय संयुक्त और समन्वित प्रयास करने चाहिए।

विडंबना यही है कि हाल तक ऐसा होता दिखा नहीं। वर्ष 2014 में अप्रत्याशित रूप से पूर्ण बहुमत हासिल कर प्रधानमंत्री बनने पर नरेंद्र मोदी ने सभी राज्य सरकारों के साथ मिलकर देश के सर्वांगीण विकास के लिए टीम इंडिया की तरह काम करने की बात कही थी, लेकिन कोरोना संकट में वह टीम एकजुट होकर काम करने के बजाय आपस में ही उलझती नजर आयी। सर्वोच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियों के बाद दिल्ली में अवश्य केंद्र और राज्य सरकार के बीच कुछ तालमेल दिख रहा है, वरना तो इस संकटकाल में भी राजनीतिक दल अपनी चुनावी बिसात बिछाने से बाज नहीं आ रहे। कोरोना संकटकाल में ज्यादातर नदारद ही रहे राजनेता अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और वर्चुअल रैलियों के जरिये अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे को धार देने में जुट गये हैं। आखिर आने वाले समय में कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव जो हैं। जाहिर है, राजनीतिक दल और राजनेता, राजनीति तो करेंगे ही, लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि देश-समाज के लिए राजनीति होती है, राजनीति के लिए देश-समाज नहीं होता।



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