इकॉनमी: रेटिंग से आगे

ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज ने 22 साल में पहली बार भारत की सॉवरेन रेटिंग गिराते हुए इसे बीएए2 से बीएए3 पर ला दिया है, जो निवेश की दृष्टि से सबसे निचली रेटिंग है। इससे पहले इस संस्था ने जून 1998 में वाजपेयी सरकार द्वारा परमाणु परीक्षण किए जाने के बाद भारत की रेटिंग गिराई थी। सामान्य स्थिति इस वक्त भी नहीं है। कोरोना की महामारी और लॉकडाउन की जकडऩ से पूरा विश्व पस्त पड़ा है। गौर करने की बात है कि भारत कोई अकेला देश नहीं है जिसकी रेटिंग गिराई गई है।

मूडीज ने सऊदी अरब और दक्षिण अफ्रीका समेत 21 और देशों की रेटिंग भी गिराई है, जो सभी विकासशील व उभरती अर्थव्यवस्था वाले देश हैं। लेकिन उनका जिक्र करके अगर हम खुद को भुलावे में रखते हैं तो हालात की गंभीरता को समझने में हमसे भारी चूक हो जाएगी।

सचाई यह है कि मूडीज द्वारा भारत की रेटिंग गिराने का फैसला कोरोना के दुष्प्रभावों पर आधारित नहीं है। यह फैसला भारत के नीति निर्माता संस्थानों की क्षमता और हमारे वित्तीय क्षेत्र के दबावों को लेकर मूडीज की समझ बताता है। यह दोहराना भी जरूरी है कि इसी रेटिंग एजेंसी ने तीन साल पहले 2017 में आर्थिक सुधारों की संभावना को आधार बनाकर भारत की रेटिंग ऊंची की थी। वे अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं और मूडीज को इनके पूरे होने की कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही।

सरकार के सामने कठिनाइयां पहले भी कम नहीं थीं, पर अब रेटिंग गिराए जाने के बाद आगे की राह थोड़ी और मुश्किल होने वाली है। जिन कंपनियों के चीन से निकलकर भारत आने की उम्मीद की जा रही थी, उनके निवेशकों को इस फैसले पर हामी भरने में हिचक हो सकती है। संस्थागत विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत पर दांव लगाना पहले की अपेक्षा और कठिन हो जाएगा। जहां तक देश के अंदर निवेश बढ़ाने की बात है तो वह प्रक्रिया भी सरकार और रिजर्व बैंक की तमाम कोशिशों के बावजूद जोर नहीं पकड़ रही।

ब्याज दरों में लगातार भारी-भरकम कटौती के बावजूद उद्योग जगत बैंकों से लोन लेने का रुझान नहीं दिखा रहा। जाहिर है, देश में मांग की कमी के अलावा मजदूरों के शहरों से गांवों की ओर पलायन ने भी कारखानों में पूरी क्षमता से उत्पादन को सपने जैसा बना दिया है। सरकार इन मुश्किलों से अनजान नहीं है। स्वयं प्रधानमंत्री ने सीआईआई की सालाना बैठक में उद्योग जगत के दिग्गजों को संबोधित करते हुए उन्हें उत्साहित करने की पूरी कोशिश की। लेकिन जिस तरह के गतिरोध ने भारतीय अर्थव्यवस्था को जकड़ लिया है उसके टूटने में अभी वक्त लगने वाला है। सरकार को आर्थिक सुधारों की राह पर आगे बढ़ते हुए ऐसे बहुत सारे कदम उठाने होंगे जिनसे देश-विदेश के निवेशकों के अंदर नई उम्मीद जगे और वे रेटिंग एजेंसियों के आकलन को एक तरफ रखकर नए निवेश की हिम्मत जुटा सकें।

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