• dainik kshitij kiran

आंखों में बारिश भरना

सोनल


समय बदलता है, कभी समय ठहर-सा जाता है। परिवर्तन होता है और फिर एक नया परिवर्तन आने के लिए कुछ और बदलाव होते हैं। ऐसा ही तो हो रहा है। ठहराव से आये जीवन को कुछ तो आगे बढ़ाना है। अपने लिए ही सही। अपने लिए कुछ करने का जी तो चाहता है। अब मौसम को ही लीजिए। हर मौसम में हर किसी की अपनी पसंद और नापसंद होती है। किसे क्या भा जाये, क्या पता। बारिश का मौसम मुझे अच्छा लगता है या यूं कहें कि अच्छा लगता था। असल में कुछ पंक्तियां उधार हैं मौसम की मुझ पर। इस बरस पहले तो बरखा बरसी नहीं, अब बरसी है तो बरस रही, शायद ये पहली बारिशों का मौसम है, जब मैंने भीगने की इच्छा नहीं की, पिछली शाम गाड़ी तक जाना असंभव-सा था। बादल झूमकर नहीं, टूटकर बरस रहे थे, मैं हैरान-सी गाड़ी तक जाने का उपाय सोच रही थी। भीतर किसी ने बोला, क्या हुआ पगली। बारिशों से घबराने वाली ये लडक़ी कौन है? आसमान में घटा देखकर दीवानी होने वाली बावरी कहां चली गई? बारिशों पर कविताएं लिखने वाली इस लडक़ी ने इस बरस दो पंक्तियां भी नहीं लिखीं, आखिर हुआ क्या है? सच आखिर हुआ क्या है? कितनी तेज दौड़ रही हूं कि एक लम्हा ठहर कर बारिशों को निहारने की भी फुर्सत नहीं है। पर इन दिनों दौड़ भी कहां हो पा रही है। दौड़-धूप भी कई बार ठहरी हुई-सी लगती है। ठहराव भी कहां रहता है। सब कुछ तो चलायमान ही है। मौसम की मानिंद। एक मां बनने के बाद का ठहराव है क्या? जो बोलता है अगर बीमार हो गई तो बच्ची को कौन संभालेगा? उफ़ ऐसा भी क्या? अब शायद एक दिन थोड़ा ठहरना है। तनहा रहना है। अपने साथ समय बिताना है। खुद से कुछ बातें करनी हैं। पुरानी यादों को फिर तरोताजा करना है। भीतर दबी नन्ही लडक़ी को वापस लाना है ताकि बारिश, रोमांस और रोमांच भीतर बचे रहें। आखिर उस लडक़ी की खिलंदड़ी को क्यों ऐसे ही खत्म होने दिया जाये। कुछ पुरानी पंक्तियां खुद को याद दिलाने के लिए। बारिशें ईंधन है तुम्हारे लिए लडक़ी, ऑक्सीजन है तुम्हारे फेफड़ों के लिए, उम्र के किसी भी मोड़ या पड़ाव पर, बारिशों से पुनर्जीवित हो उठना।

बारिशों में अक्सर उबासियां आती हैं, चादर लपेटकर सोने का जी करता है। समन्दर-भाप से बनते बादल सुना है, इन आंखों में बारिश कौन भरता है.



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