आंख खोलती रिपोर्ट



इस सदी के अंत तक देश के मौसम में होने वाले अप्रत्याशित बदलावों का चित्र उकेरती पुणे स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मेटिओरॉलॉजी की रिपोर्ट जहां हमारी चिंता बढ़ाती है, वहीं भविष्य की रणनीतियों के निर्धारण की राह भी दिखाती है। आईआईटीएम पुणे की यह रिपोर्ट मौसम के बदलते तेवरों का ऐसा आईना दिखाती है, जो हमारे नीति-नियंताओं के लिए आंख खोलने वाला है। रिपोर्ट में संकेत है कि सदी के अंत तक देश के औसत तापमान में 4.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार के एक संस्थान ने ग्लोबल वार्मिंग के विश्वव्यापी प्रभावों के मद्देनजर अपने अध्ययन को भारत पर केंद्रित किया है। ‘असेसमेंट ऑफ क्लाइमेट चेंज ओवर द इंडियन रीजन’ शीर्षक रिपोर्ट हमें भारतीय वातावरण में होने वाले अप्रत्याशित परिवर्तनों के बाबत चेताती और उसी के अनुरूप खेती-किसानी से लेकर स्वास्थ्य नीतियों के निर्धारण की जरूरत बताती है। इससे हम जलवायु परिवर्तन की दिशा व उसके नकारात्मक प्रभावों का अध्ययन कर सकेंगे। रिपोर्ट चेताती है कि विश्वव्यापी तापमान में वृद्धि से समुद्र तल का जल स्तर भी करीब एक फुट बढ़ जायेगा जो समुद्रतटीय इलाकों में विस्थापन और तमाम तरह की चुनौतियां पैदा कर सकता है। रिपोर्ट ऐसी नीतियां तैयार करने का संदेश देती है, जिनसे जन-धन की हानि को कम से कम किया जा सके। यानी आगामी अस्सी साल में होने वाले जलवायु परिवर्तन के अनुरूप जीवन को कैसा ढाला जाये। यह रिपोर्ट व्यापक अध्ययन के साथ भारतीय परिवेश पर ध्यान केंद्रित करती है, अत: इसके निष्कर्ष हमारी जरूरतों के अनुरूप हो सकते हैं। नि:संदेह जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया वैश्विक है और हम इसे बदल पाने में सक्षम नहीं है, मगर इतना जरूर किया जा सकता है कि हमारी नीतियां उन चुनौतियों का मुकाबला करने में सक्षम हों, जो निकट भविष्य में पैदा होने जा रही हैं।

नि:संदेह यह मार्गदर्शक रिपोर्ट हमें जलवायु परिवर्तन से होने वाले बदलावों की गति को नियंत्रित करने वाले स्वदेशी प्रयासों की राह दिखाती है। जनजागरण के जरिये लोगों को इस चुनौती के खतरों से अवगत कराया जा सकता है। साथ ही सत्ताधीशों को बाध्य किया जा सकता है कि विकास की नीतियां पर्यावरण संरक्षण के अनुकूल हों। जलवायु परिवर्तन और उसके प्रभावों से दो-चार होना हमारी नियति है। जरूरत इस बात की है कि हमारी खाद्य सुरक्षा बाधित न हो। खासकर फसलों का निर्धारण पानी की उपलब्धता और बदलते तापमान के अनुरूप हो। देश में पिछले दिनों बारिश के पैटर्न में बदलाव आया है। कहीं मानसूनी बारिश के प्रतिशत में कमी आई है तो कहीं कम समय में अधिक बारिश होने की प्रवृत्ति नजर आई है। बारिश की अवधि में भी बदलाव आया है। अत: हमें फसलों का निर्धारण जलवायु में आ रहे बदलावों के अनुरूप ही करना होगा। कम पानी वाली फसलों को परंपरागत फसलों के मुकाबले तरजीह देनी होगी। यह जानते हुए कि देश बेकाबू जनसंख्या वृद्धि से जूझ रहा है। बढ़ती जनसंख्या के खाद्यान्न उपलब्धता पर पडऩे वाले दबाव को भी ध्यान में रखना होगा। यानी बदलाव के दौर में अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के नये विकल्प तलाशने होंगे। केवल फसल ही नहीं, हमारे स्वास्थ्य पर भी जलवायु परिवर्तन का घातक असर हो सकता है। मौसम के चरम से जहां लू लगने की घटनाओं में वृद्धि होगी, दिल व तंत्रिकातंत्र से जुड़ी बीमारियों तथा मानसिक विकारों की संख्या में इजाफा हो सकता है, जिसके लिए अभी से हमें चिकित्सा तंत्र विकसित करना होगा। कोशिश हो कि हम इस अप्रत्याशित बदलाव से अपने वातावरण, खेती व पानी के परंपरागत स्रोतों की भी रक्षा कर सकें। साथ ही बुनियादी ढांचे को भी आसन्न चुनौतियों के अनुरूप ढाला जाये, जिससे हम न केवल खाद्यान्न व पानी का संरक्षण कर सकें बल्कि अपनी जैव विविधता का भी पोषण कर सकें। इस दौरान तूफानों की संख्या में वृद्धि की भी चेतावनी है, मुकाबले के लिए अलग से तैयारी की जरूरत होगी, जिसके लिए शहरीकरण के विस्तार में सुरक्षा उपायों को ध्यान में रखना जरूरी होगा।


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