आंकड़ों में दर्ज नहीं जो मानवीय क्षति


सरस्वती रमेश

कोरोना और लॉकडाउन ने लोगों से बहुत कुछ छीन लिया। भविष्य में जब इस महामारी की बात होगी तो वह मौत के आंकड़े, आर्थिक मंदी और लॉकडाउन में सिमट कर रह जाएगी। इनसे इतर कोरोना के दुष्प्रभाव का कोई सिस्टेमिक आकलन नहीं मिलेगा। जबकि निजी क्षति और भावनात्मक नुकसान ऐसे नुकसान हैं, जिनमें आदमी ताउम्र घुल-घुल कर मरता है।

निजी स्तर पर कोरोना का कई तरह से असर रहा। लोग बेरोजगार हुए या आमदनी घट गयी। कितने लोग बेरोजगार हुए, यह आंकड़ा देने मात्र से बेरोजगार हुए व्यक्ति की वेदना को नहीं समझा जा सकता। लेकिन हमारे शोध का जो तरीका है वह महज सैंपल डाटा पर आधारित होता है। त्रासदी में हुई प्रत्यक्ष हानि तो गिनी जाती है मगर परोक्ष को छोड़ दिया जाता है। मसलन डिप्रेशन में की गई आत्महत्या इसी परोक्ष प्रभाव का हिस्सा है। इन परोक्ष प्रभावों का उपचार आमतौर पर सरकारी प्रयासों की लिस्ट में नहीं होता। यदि मानसिक बीमारियों के लिए उपचार की व्यवस्था है तो डिजास्टर मैनेजमेंट सिर्फ भौतिक राहत तक ही क्यों सीमित है। इसमें भावनात्मक और निजी बर्बादी को शामिल कर उसे दूर करने के उपाय भी किये जाने की दरकार है। इसके लिए हमारे सरकारी तंत्र को संवेदनशील बनने की जरूरत है।

व्यक्तिगत क्षति की विकरालता को कुछ उदाहरणों से समझा जा सकता है। मेरे पड़ोस की महिला के पति सदर बाजार की किसी दुकान में काम करते थे। तनख्वाह यही कोई पंद्रह हजार। पूनम के तीन बच्चे हैं। बड़ी लडक़ी ने हाल ही में 12वीं पास की है। पति को शुगर था तो वो अक्सर बीमार पड़ जाते थे। बीमारी बढ़ती देख पूनम भी किसी कम्पनी में लग गई। सैलरी छह हजार। बेटी भी डेटा एंट्री करने लगी। इसी साल होली के दिन उनके पति की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। सरकारी अस्पताल में उनकी मौत हो गई। अभी चिता की आग ठीक से ठंडी भी नहीं हुई थी कि लॉकडाउन शुरू हो गया। बेटी जिस कंपनी में काम करती थी, वह फर्जी निकली। सबकी दो-तीन महीने की सैलरी लेकर फरार हो गई। इधर पड़ोसी महिला का काम भी बंद हो गया। वह यहां पिछले दो दशक से किराए पर रहती है। उसका राशन कार्ड भी नहीं है। अब उसके सामने क्या रास्ता बचता है भूख से मरे या अपने बच्चों सहित खुदकुशी कर ले

कुछ ऐसी ही त्रासद कहानी है एक युवक की। गुरुग्राम की एक कंपनी में काम करता था। ज्यादा पढ़ा नहीं था। फिर भी ठीकठाक कमाता था। बचत के पैसों से उसने पिछले साल घर खरीद लिया। 10 लाख कैश में दिया, 20 लाख लोन करा लिया। अभी 6 महीने भी नहीं बीते थे कि कोरोना के चलते लॉकडाउन आ गया। कंपनी ने एक महीना बैठाकर सैलरी दी। दूसरे महीने जवाब दे दिया। युवक आजकल डिप्रेशन में है। पत्नी गांव की है। शहर के रहन-सहन से एकदम दूर। दो बच्चे भी हैं जो नर्सरी और सेकेंड में पढ़ते हैं। युवक ने अपनी बचत के सारे पैसे लोन चुकाने में पहले ही दे दिए हैं। अब उसे अपनी रोटी की चिंता करनी चाहिए या पिछले 10 साल से पाई पाई जोडक़र खरीदे गए घर की।

ये तो हुई आर्थिक क्षति से उपजी अवसाद की स्थिति। इससे इतर भी एक क्षति हुई है। हमारी संवेदनाओं की क्षति। राम प्रकाश पटवा मुम्बई में अपने तीन बेटों के साथ रहते थे। पत्नी को गुजरे जमाना हो गया था। राम प्रकाश ने ही अपने तीनों बच्चों को मां बन कर पाला। बच्चे बड़े हुए तो सबने अपना-अपना कारोबार खड़ा कर लिया। पिता ने उनकी हर मुमकिन सहायता की। अब वो बूढ़े हो चले थे। यही कोई 65-70 के बीच थी उनकी उम्र। लॉकडाउन के दौरान एक दिन उनकी तबीयत खराब हो गई। सांस लेने में दिक्कत और घबराहट। रात के दस बज चुके थे। मझला बेटा उन्हें प्राइवेट हॉस्पिटल लेकर गया। डॉक्टरों ने कहा सुबह पहले कोरोना का टेस्ट करेंगे तभी इलाज शुरू होगा। बेटे ने किसी तरह पिता को भर्ती तो करा दिया मगर कोरोना का खौफ ऐसा कि खुद बेटा एक रात के लिए पिता के पास न ठहर सका। वह घर लौट आया।

सुबह हॉस्पिटल से फोन पहुंचा, आपके पिता जी नहीं रहे। पता नहीं बेटे को पिता के पास न ठहरने की आत्मग्लानि हुई या नहीं लेकिन मरते वक्त पिता को अपनी औलाद पर जरूर आत्मग्लानि हुई होगी। पिता की संदिग्ध मौत के कारण कोई उनको कंधा देने के लिए भी तैयार न हुआ। स्वयं बेटे भी मन से तैयार न थे। ये सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि यदि पिता की जगह उनका बच्चा हॉस्पिटल में होता तो क्या तब भी वो कोरोना के खौफ से उसे अकेला छोड़ आते। और भी हजारों किस्से हैं, जिसमें प्रियजनों को आखिरी बार देखने व अंतिम संस्कार तक करने के लिए परिवार तरसता रहा। ये वो किस्से हैं जो बताते हैं इतिहास के ब्योरे इनसान की वेदनाओं के आगे कितने बौने होते हैं।

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