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आलोचना कैसे हो बर्दाश्त!


नीतीश कुमार पिछले चुनाव अभियान के समय से आपा खोते रहे हैं। विधानसभा के पिछले सत्र के दौरान वे विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव से तू तू- मैं मैं पर उतर आए थे। अभी हाल में पटना में हुई एक हत्या से जुड़े सवाल करने पर वे पत्रकार से उलझ गए। जाहिर है, कठिन सवाल उन्हें पसंद नहीं है। आलोचना से वे गुरेज रखते हैं। ये बात पहले भी थी, लेकिन जब अच्छे दिन हों तो इनसान की बहुत की खामियां छिप जाती हैं। अब चूंकि नीतीश के अच्छे दिन नहीं हैं, तो उनकी असहनशीलता खुल कर जाहिर हो रही है। अब ये उनकी असहनशीलता की ही मिसाल है कि राज्य पुलिस ने आगाह किया है कि ट्विटर, फेसबुक जैसे मंचों पर सरकार की आलोचना को अब साइबर क्राइम के रूप में देखा जाएगा।

इस तरह के मामलों की जांच की जिम्मेदारी बिहार में साइबर क्राइम की नोडल संस्था आर्थिक अपराध इकाई (ईओडब्ल्यू) को सौंप दी गई है। इकाई के अपर पुलिस महानिदेशक नैयर हसनैन खान ने राज्य सरकार के सभी विभागों को एक चि_ी लिखकर इसके बारे में अवगत कराया है। खान ने लिखा है कि "सोशल मीडिया/ इंटरनेट के माध्यम से सरकार, माननीय मंत्रीगण, सांसद, विधायक एवं सरकारी पदाधिकारियों के संबंध में आपत्तिजनक/ अभद्र एवं भ्रांतिपूर्ण टिप्पणियां" साइबर अपराध की श्रेणी में आती हैं। खान ने सभी महकमों से कहा है कि ऐसा कोई भी मामला उनके संज्ञान में आए तो वे तुरंत ईओडब्ल्यू को सूचित करें, ताकि ऐसी टिप्पणी करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। लेकिन यह नहीं बताया गया है कि ऐसी कार्रवाई किस कानून या किस धारा के तहत की जाएगी। बहरहाल, जब देश में कानून का राज ही कमजोर हो रहा हो, तो ऐसे सवालों का कोई मतलब नहीं बचता। सरकार जिस धारा के तहत चाहेगी कार्रवाई कर देगी। इस मामले में उत्तर प्रदेश की मिसाल उसके सामने है, जहां किसे किस धारा के तहत पकड़ा या दंडित किया जाता है, ये समझना अब कानून के विशेषज्ञों के लिए भी मुश्किल हो गया है। बिहार पुलिस मुख्यालय ने कहा है कि नया आदेश सिर्फ अफवाह फैलाने वालों और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने वाली टिप्पणियों तक सीमित है। उन्होंने कहा- "आलोचना लोकतंत्र के लिए फायदेमंद है, लेकिन आलोचना तर्कसाध्य और शालीन भाषा में होनी चाहिए।" तो बिहार पुलिस की निगाह में आलोचना का अधिकार सशर्त है और ये शर्तें क्या होंगी, यह भी वही तय करेगी!

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