आबादी नियंत्रण में समृद्ध जीवन की राह


ज्ञानेन्द्र रावत

आबादी का गणित हमेशा से दुनिया को बदलने में अहम भूमिका निभाता रहा है। आज बढ़ती आबादी का संकट दुनिया के लिए भयावह चुनौती बन चुका है। इस बारे में विख्यात वैज्ञानिक प्रो. फ्रैंक फेनर ने एक दशक पहले चेतावनी दी थी कि मानव जाति जनसंख्या विस्फोट और प्राकृतिक संसाधनों की बेलगाम खपत को बर्दाश्त नहीं कर पायेगी। नतीजतन अगले सौ सालों में धरती पर से मानव जाति का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा। अनेक अन्य जीवों का भी खात्मा हो जायेगा। इस स्थिति को बदला नहीं जा सकता। अब बहुत देर हो चुकी है। जलवायु परिवर्तन की भी मानव जाति के लिए बड़ी चुनौती है। जलवायु परिवर्तन महज एक शुरुआत है जबकि हमें मौसम में होने वाले बदलाव काफी पहले दिखने शुरू हो गए थे।

इस बारे में दुनिया के वैज्ञानिकों-पारिस्थितिकीविदों में अलग-अलग मत हैं लेकिन अधिकांश फेनर के मत से सहमत हैं। ऑप्टीमम पॉपुलेशन ट्रस्ट के उपाध्यक्ष सिमॉन रास कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और तेजी से बढ़ती आबादी के कारण मानव जाति भीषण चुनौतियों का सामना कर रही है। इसका मुकाबला कर पाना आसान नहीं होगा। एक अन्य विद्वान जेम्स लवलॉक ने 2006 में ही चेतावनी दी थी कि अगली सदी में ग्लोबल वार्मिंग के कारण दुनिया की आबादी 50 करोड़ तक सिमट सकती है। उनके अनुसार जलवायु परिवर्तन को रोकने का कोई भी प्रयास इस समस्या को हल करने में कामयाब नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र की मानें तो हमारे देश की आबादी जो अभी एक अरब 35 करोड़ के आसपास है, सदी के उत्तरार्द्ध शुरू होने तक एक अरब 50 करोड़ पार कर जायेगी। जहां तक दुनिया की सबसे बड़ी आबादी होने के गौरव का सवाल है तो यह कीर्तिमान 2027 के आखिर में ही हासिल कर लेंगे। दुनिया के स्तर पर देखें तो 1987 में दुनिया की आबादी पांच अरब थी। इसमें हर साल 80 लाख की दर से बढ़ोतरी हो रही है। 2050 तक इसके 9.8 अरब होने का अनुमान है जो सदी के अंत तक साढ़े बारह अरब का आंकड़ा पार कर जायेगी।

आबादी की चुनौतियों को बढ़ाने में प्रशासनिक विफलताओं का भी बहुत बड़ा योगदान है। कारण बढ़ती आबादी दुनिया के देशों के लिए अब लाभांश नहीं बल्कि सीमित संसाधनों पर बोझ बनती जा रही है। बढ़ती आबादी का खाद्य संकट गहराने में योगदान जगजाहिर है। ऐसी स्थिति में बढ़ते शहरीकरण के चलते लागोस, साओ पाउलो और दिल्ली जैसे कई महानगर बनेंगे। इसका दबाव पर्यावरण पर पड़ेगा ही। उस स्थिति में और खतरे बढ़ जाते हैं जबकि पर्यावरण प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंचने के कारण प्राकृतिक संसाधन खत्म होने के कगार पर पहुंच गए हों।

संयुक्त राष्टर्् की मानें तो देश में जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों का दुखद परिणाम ही कहा जायेगा कि सदी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते भारत की आबादी का आंकड़ा 150 करोड़ को पार कर जायेगा। उस दशा में जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों के चलते चीन की आबादी 110 करोड़ पर रुक जायेगी। यह चीन की एक बच्चा नीति का परिणाम है। इसके तहत 2050 तक दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जनसंख्या भारत की आबादी का केवल 65 फीसदी रह जायेगी। आज जब हम चीन को पीछे छोड़ आगे बढऩे की बात कर रहे हैं तो हमें चीन से सबक लेना ही होगा। कारगर नीतियों से जहां चीन को रोजगार, भोजन, शिक्षा और चिकित्सा पर समुचित ध्यान देने का अवसर मिला, लिंग-भेद की समस्या पर अंकुश लगा, वहीं आसानी से एक बच्चे की परवरिश कर पाने की वजह से पारिवारिक स्तर में भौतिक-आर्थिक बदलाव भी देखने को मिले। पांच साल पहले उसने एक दंपति के लिए दो संतान के फार्मूले का विकल्प दिया था। उसके बावजूद आज भी वहां अधिकांश दंपति एक संतान को ही परिवार के सुख का आधार मानकर चल रहे हैं।

इस नीति का दूसरा पहलू भी है, वह यह कि आज वहां तीस-चालीस साल के व्यक्ति पर तकरीबन तीन से चार बुजुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी है, जिसके कारण लोग परेशान हैं। प्रोफेसर यी फुजियांन की मानें तो आगे चलकर यही बुजुर्ग आबादी चीन के आर्थिक विकास के लिए बहुत बड़ी समस्या बनेगी। इसमें दो राय नहीं कि हमारे यहां जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को नाकाम करने में जाति-धर्म के नाम पर अपनी रोटी सेंकने वाले स्वयंभू ठेकेदारों और राजनैतिक दलों ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इसलिए हमें भी चीन की ही तरह तेजी से आगे बढऩे का रास्ता निकालना होगा। क्योंकि हमारे लिए गरीबी-बेरोजगारी ही नहीं, इससे उपजी कुपोषण जैसी समस्याओं से पार पाना भी टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

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