आपदाओं का दौर

यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोरोना संकट प्राकृतिक रौद्र है या जैविक लैब से निकली मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं का हश्र। लेकिन इतना तय है कि इस संकट ने हमें कुदरत से सामंजस्य बनाकर प्राकृतिक जीवन जीने का संदेश दिया है। हाल ही के दिनों में मौसम के मिजाज में जो अप्रत्याशित तल्खी देखने में आ रही है, उसने मनुष्य के अस्तित्व के लिए चुनौती पैदा कर दी है। मौसम का मिजाज इतनी तेजी से ‘पल में तोला, पल में माशा’ कहावत को चरितार्थ कर रहा है कि अगले पल कैसा मौसम होगा, कहना कठिन है। कुछ ही दिन पहले पारा रिकॉर्ड तोडक़र मनुष्य के जीवन को चुनौती दे रहा था, अब ओले बरस रहे हैं। अभी देश के पूर्वी क्षेत्र में अम्फान का कहर थमा था कि अब पश्चिमी तट पर निसर्ग का खौफ व्याप्त हुआ। अच्छी बात है कि निसर्ग मुंबई से कुछ पहले दिशा बदलकर नुकसान टाल गया। यदि मुंबई पर इसका साया पड़ता तो पहले ही कोरोना संकट से बुरी तरह त्रस्त इसकी दशा की कल्पना करना कठिन था। हाल ही के दिनों में दिल्ली बार-बार भूकंप के झटकों से सहमी है। बीते सप्ताह असम में वर्षा व भूस्खलन से हुई मौतों की खबरों की स्याही अभी सूखी नहीं थी कि प्रकृति का प्रकोप नये स्वरूप में सामने आ गया। दुनिया के शुष्क इलाकों में भारी बारिश व बाढ़, रेगिस्तानी इलाकों में बर्फबारी व ओलों की बारिश जैसे मौसम के असामान्य तेवर दिखने आम हो गये हैं। धरती पर चक्रवातों-तूफानों और अतिवृष्टि-अनावृष्टि का जो दौर चल रहा है, उसे देखकर लगता है कि दुनिया जैसे प्राकृतिक आपदाओं का घर बन गई है। ऐसा लगता है प्रकृति मनुष्य को सबक सिखाना चाहती है कि अभी भी वक्त है कुदरत का सहचर बनकर रहो। कोरोना संकट में प्रकृति का सौंदर्य जिस तरह निखरा, हवा-पानी साफ हुआ तथा वन्य जीवों का विचरण सहज हुआ, उसने इनसान को आईना ही दिखाया कि प्रकृति के कार्यक्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप न किया जाये।

दरअसल, मनुष्य ने खुद का प्रकृति का स्वामी बनने का जो दंभ पाला और ग्लोबल वार्मिंग को जिस तरह प्रश्रय दिया, उसके चलते प्रकृति का रौद्र रूप सामने आ रहा है, जिसके चलते जहां लोगों को भारी क्षति उठानी पड़ रही है, वहीं पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा संकट में पड़ गई है। हाल ही के दिनों में आमेजन के जंगल से आस्ट्रेलिया के जंगलों में लगी भीषण आग बताती है कि हम अपनी प्राकृतिक विरासत को संभाल नहीं पा रहे हैं, जिसके चलते पूरी दुनिया में वन-संपदा का संतुलन बिगडऩे लगा है। मनुष्य विलासिता के चलते उन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन तीव्र हुआ, जो ग्लोबल वार्मिंग का सबब बन रही हैं। विकसित राष्ट्र अंधाधुंध मुनाफा कमाने की होड़ में हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में प्राकृतिक आपदाएं हमें सचेत कर रही हैं कि मनुष्य अपने व्यवहार में संतुलन-संयम दिखाये। यह ठीक है कि विज्ञान ने मानव जीवन को संकटों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। अम्फान व निसर्ग का समय रहते पता चलने से हम हजारों जिंदगियां बचा पाये। लेेकिन विज्ञान प्रकृति का विकल्प बनने की कोशिश न करे। हम एक तो प्रकृति का संरक्षण व संवर्धन करें, वहीं ऐसी चुनौतियों से मुकाबले के लिए सुरक्षा तंत्र भी विकसित करें। यह तय है कि दुनिया के देश अभी भी ग्लोबल वार्मिंग के आसन्न भयावह संकटों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। ऐसे में अपने नागरिकों के बचाव और अपनी खाद्य सुरक्षा के संरक्षण के लिए हम समय रहते सतर्क पहल करें। केरल में मानसून ने दस्तक दे दी है। मानसून सुखद एहसास के साथ बाढ़ व मौसमी बीमारियां लेकर भी आता है। आशंका है कि कोरोना के साथ अन्य संक्रमक रोगों के प्रसार की आशंकाएं तीव्र होंगी, जिसके लिए हमें अभी से सतर्क रहना होगा।

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