आधार मजबूत कर बदलाव की राह

यश गोयल


सत्ता आसीन होने के बाद शुरू का एक साल तो नई सरकार बनाने और सत्ता से हारी सरकार की गलतियां ढूंढऩे में निकल जाता है। गत वर्ष 11 दिसम्बर को राजस्थान मेंकांग्रेस के बहुमत में आने पर 17 दिसम्बर को तीसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत ने बीजेपी सरकार की कमियां या जांच बैठाने पर अपना समय नहीं बिगाड़ा बल्कि अपने दूसरे कार्यकाल (2008-13)की रुकी हुई योजनाओं : पेट्रो रिफाइनरी और मेट्रो रेल को पुनर्जीवित करने और नयी योजनाओं को बनाकर लांच करने पर ध्यान दिया। एक साल के जश्न पर ये सरकार पिछली भामाशाह हेल्थ कार्ड को बदल कर निरोगी राजस्थान योजना में 'जन आधार कार्ड ला रही है।

दिसम्बर, 2018 विधानसभा चुनाव में 99 विधायकों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस का विजयी ग्राफ और बढ़ा जब जनवरी में रामगढ़ (अलवर) की चुनाव से बची हुई एक सीट पर कांग्रेस की महिला प्रत्याशी श्रीमती साफिया ने नटवर सिंह, पूर्व विदेशमंत्री के बेटे जगत सिंह (बीएसपी) को शिकस्त दी। मगर, मई में हुए लोकसभा चुनाव में गहलोत सरकार और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलेट (उपमुख्यमंत्री) को धूल चाटनी पड़ी जब मोदी के नेतृत्व में लड़ी भाजपा ने 25 में से 25 लोस सीट पर दूसरी बार कब्जा कर लिया। 2014 के लोस चुनाव में भी कांग्रेस को राज्य से एक भी एमपी नहीं मिला था। यहां तक की गहलोत अपने पुत्र वैभव गहलोत को भी जोधपुर का चुनाव भी जिता सके थे।

जोड़-तोड़ के डर से गहलोत ने अपना जादुई करिश्मा दिखाते हुए बीएसपी के सभी छह विधायकों को अपनी ओर आकृष्ट कर कांग्रेस में विलय करा लिया। इसी के साथ दो विधानसभा के उपचुनाव में बीजेपी से मण्डावा सीट छीन ली और खींवसर विस पर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के गठजोड़ के चक्कर में बीजेपी ने अपनी सीट गंवा दी। दो-तिहाई बहुमत के साथ कांग्रेस के पास अब 200 में से 108 विधायक हैं और भाजपा के 73 में से एक घटकर 72 ही रह गये।

राजस्थान में नवम्बर माह में हुए 44 नगर निकाय चुनावों में से कांग्रेस ने फिर बाजी मारकर 36 निकायों में उसकी पार्टी के अध्यक्ष और उपाध्याक्ष चुनकर आ गये। भाजपा के पहले जाट प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया और पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की आपसी खींचतान से भगवा पार्टी सिर्फ 13 निकायों में चेयरमैन पदपर अपनी जीत दर्ज करा पाई।

कांग्रेस की विधायक संख्या के आधार पर पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह राजस्थान से खाली हुई एक मात्र राज्यसभा सीट पर निर्विरोध निर्वाचित हुए, जिसका लाभ गहलोत को व्यक्तिगत मिला। सोनिया गांधी के कार्यकारी अध्यक्ष बनने और डॉ. सिंह के राज्य से राज्यसभा में चुने जाने से गहलोत की सीएम की कुर्सी पर पकड़ और मजबूत हुई और उपमुख्यमंत्री पायलेट राहुल गांधी के पार्टी हाई कमांड से दूर हो जाने पर भी पार्टी और अपने पंचायत मंत्रालय पर दबदबा बनाये हुए हैं।

कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों में गहलोत ही हैं जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आरएसएस और भाजपा की नीतियों और योजनाओं पर खुलकर प्रहार करते हैं। अब गहलोत ये भी मुद्दा उठाये हुए हैं कि राजनीति का पूरा खेल ब्लैकमनी पर टिका हुआ है, चाहे वो बॉन्ड हो या कैश के रूप में चंदा। जब तक राजनीतिक दलों को दो नम्बर की फंडिंग बंद नहीं होगी तब तक देश से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। साथ ही सीएम बीजेपी को बांड का करोड़ों रुपये का सबसे बड़ा बेनिफिशियरी बताते हैं।

देश में पहली बार मोदी सरकार द्वारा घोषित सवर्ण-वर्ग के पिछड़ों को आरक्षण (ईडब्ल्यूएस) पर कांग्रेस सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में परिवार की सालाना आय ही आरक्षण का आधार माना है, जिसमें अधिकतम आय 8 लाख रुपये है तथा अचल संपत्ति संबंधी सभी प्रावधान समाप्त कर राजकीय सेवाओं में 10 प्रतिशत का आरक्षण लागू कर ईडब्ल्यूएस सर्टिफिकेट आसानी से दिलवाने की घोषणा से गहलोत ने केंद्र को भी ऐसा करने का प्रस्ताव भी भेजा हुआ है।

भीड़ के हमलों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 'राजस्थान लिंचिंग से संरक्षण विधेयक, 2019 और वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप विधेयक भी पारित किये मगर केंद्र सरकार के स्तर में ये दोनों लटके हुए हैं। पहलू लिंचिंग केस में राज्य सरकार ने दिवंगत के परिवार के लिए कई कदम उठाये हैं। किंतु हरियाणा का शातिर गैंगस्टर पपलू गूजर जो तीन महीने पहले बहरोड़ पुलिस थाना से भागा था, आज भी एसओजी पुलिस की पकड़ से दूर है। 20,000 हजार से अधिक परिंदों का सांभर-नमक-झील में अचानक दम तोड़ देने का जवाब और उपाय आज भी इस सरकार के पास नहीं है।

सत्ता और पीसीसी (संगठन) में दो ध्रुव बने हुए हैं और कार्यकर्ताओं में असंतोष है कि मंत्री उनकी नहीं सुनते और एआईसीसी प्रभारी अविनाश पांडे के आश्वासन के बाद भी गहलोत चुनाव की आड़ में राजनीतिक नियुक्तियां एक साल से टाल रहे हैं। आगामी वर्ष के प्रारंभ में पंचायत चुनाव की सरगर्मियों के बीच बीजेपी अपने गढ़ संभालने में लगी है तो कांग्रेस को मोदी फैक्टर से मुक्ति मिल जाने का लोभसंवरण नहीं हो पा रहा है।

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