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आदत सुधारने को महंगा तेल

आलोक पुराणिक


विक्रम की पीठ पर सवार वेताल ने कहा—अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भाव गिर रहे हैं, देश में डीजल-पेट्रोल के भाव बढ़ रहे हैं, क्यों विक्रम, क्यों विक्रम!

विक्रम ने कहा—बेताल तू मुझे टीवी एंकर समझता है क्या कि मेरे पास हर सवाल का जवाब होगा। मैं सिर्फ विक्रम हूं, कच्चे तेल की पक्की जानकारी सिर्फ सरकार के पास होती है, जैसे ही कच्चे तेल के भाव गिरते हैं, भारत में पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ा दिये जाते हैं, ताकि पब्लिक को बुरी आदत न पड़ जाये, पब्लिक कुटैव की गिरफ्त में न आ जाये।

वेताल ने पूछा—पेट्रोल-डीजल के भावों का पब्लिक के कुटैव का क्या रिश्ता है विक्रम।

विक्रम ने बताया—ग्लोबल बाजार में तेल सस्ता हो गया और यहां पब्लिक को सस्ते में पेट्रोल-डीजल खरीदने की आदत हो गयी तो यह आदत खराब लग जायेगी। सस्ता रोये बार-बार, महंगा रोये एक बार, इस कहावत पर सरकार अमल करती है और जनता को रोने नहीं देती, सस्ते पेट्रोल-डीजल के भाव बढ़ाती जाती है वेताल, पब्लिक है, तो उसे रोना ही है, सस्ते पर रोये इससे अच्छा है कि महंगे पर रोये।

वेताल ने कहा—हे विक्रम देख, सडक़ों पर श्रमिक जाते हुए देखे, बहुत दुखी थे वे, और हाई-फाई सोसायटी के कुमार साहब भी दुखी थे अंटी में पंद्रह लाख रुपये थे, पर कोरोना के बाद अस्पताल में एडमिशन न मिला। अस्पताल ने एडमिशन उसे दिया, जिसकी अंटी में पचास लाख था।

विक्रम—वेताल पॉजिटिव सोचना चाहिए। समानता आ गयी है, समानता मच गयी है। कल्लू भी परेशान है और कुमार साहब भी परेशान हैं। कल्लू भी सडक़ पर मर सकता है, तो अस्पताल के बाहर सडक़ पर कुमार साहब भी दम तोड़ सकते हैं, अस्पताल में एडमिशन न मिलने पर। कैसी समानता आ गयी है न। देख यूं तो कार पर चलते हैं कुमार साहब, पर अब कल्लू जैसे दिखाई दे रहे हैं। बेबसी की समानता है। देख इसमें पॉजिटिव देख।

वेताल ने आगे कहा—पीवीआर सिनेमाहॉल वाले भी परेशान हैं, उनके शेयर के भाव जनवरी से लेकर अब तक आधे हो गये हैं, पंछीलाल भी परेशान हैं, उनके बॉस ने कह दिया है कि कल से न आना, वर्क फ्रॉम होम, जो चाहे मन करे, हम सेलरी न देंगे। पीवीआर सिनेमाहॉल वाले और पंछीराम बराबर के लेवल पर परेशान हैं।

वेताल—मंदी आ गयी है! सब तरफ।

विक्रम—न कहीं मंदी न आयी है। सोने के भाव जनवरी से लेकर अब तक करीब 25 प्रतिशत उछल गये हैं काहे की मंदी।

वेताल—तू अजब एक्सपर्टाना बात कर रहा है विक्रम, सब्जीवालों की सब्जी बेकार चली गयी, कोई पैसा न मिला, मंदी में निपट गये सब।

विक्रम—सब्जी वालों को सोने के कारोबार में उतर आना चाहिए, सब्जी वाले सोना नहीं बेच रहे हैं, यह उनकी व्यक्तिगत समस्या है।

वेताल—विक्रम तू परम ज्ञानी हो गया, थोड़ा-सा ज्ञानी और हो जा, तो फिर तू टीवी एंकर बनने काबिल हो जायेगा।


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