आज़ादी की आड़ में नकारात्मकता का उफान

क्षमा शर्मा


पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्विटर और फेसबुक पर नाराजगी जाहिर की। और इन्हें जो कानूनी स्वायत्तता मिली हुई थी, उसे खत्म कर दिया। ट्रंप का कहना था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब दूसरे की स्वतंत्रता का हनन नहीं है।

ट्रंप से, उनकी कार्यशैली, उनके बड़बोलेपन से आप असहमत हो सकते हैं, मगर उनकी इस बात में दम है। सोशल मीडिया को अपनी सीमाएं समझनी होंगी क्योंकि दुनिया में कहीं एबसोल्यूट आज़ादी जैसी चीज नहीं होती। हमारी आज़ादी तभी बनी रह सकती है जब हम दूसरे की आज़ादी को भी बनाए रखें।

यह ठीक है कि सोशल मीडिया ने हमें अपनी बात कहने की आज़ादी दी है, मगर नेगेटिविटी और घृणा फैलाने में भी सोशल मीडिया का कोई जवाब नहीं, क्योंकि यहां किसी तरह की रोक-टोक नहीं। प्रिंट मीडिया की तरह न कोई जवाबदेही है, न ही कोई फिल्टर, जिसमें छन-छनकर चीजें बाहर आती हैं। समाज के हर तबके का ध्यान रखा जाता है, क्योंकि अखबार के पाठक हर तबके से आते है। अक्सर किसी कम्युनिटी को निशाना नहीं बनाया जाता।

लेकिन सोशल मीडिया में किसी को नीचा दिखाना, किसी को नीचे गिराना, झूठी-सच्ची खबरें किसी के भी नाम से दे देना, पुराने फोटो, वीडियो, दूसरे देश के फोटो, घटनाएं अपने देश की घटनाएं बताकर डालना आम बात है। किसी से स्कोर सैटल करना, बदनाम करना, ब्लैकमेलिंग सब कुछ चलता है, के खाते में आता है। ठीक है कि झूठी बातें पकड़ में आ जाती हैं, मगर कई बार एक झूठी बात के कारण किसी का पूरा जीवन बर्बाद हो सकता है। आपकी आज़ादी किसी की बर्बादी पर क्यों खड़ी होनी चाहिए। लेकिन जो लोग इन दिनों आज़ादी-आज़ादी गला फाडक़र चिल्लाते हैं, वे बिल्कुल उसी वक्त अपनी इसी तथाकथित आज़ादी के डंडे से न जाने कितनों का शिकार करते हैं। इसके अलावा गान तो पॉजिटिविटी और अच्छी बातों का होता है, मगर जिसको देखो वह नकारात्मक बातें करके खुद को दूसरे से बड़ा बनाने और प्रकारंतर से बदला लेने की कोशिश करता है। जब से कोरोना और लॉकडाउन शुरू हुआ है, तब से ऐसी बातों की बाढ़ आ गई है। क्या पढ़े-लिखे, क्या अनपढ़, सब घटिया बातें करके, अपने को दूसरे से श्रेष्ठ सबित कर रहे हैं।

शाहीन बाग में औरतें तब भी धरने पर बैठी थीं, जब कोरोना तेजी से फैलने लगा था। एक संवाददाता ने जब वहां बैठी कुछ औरतों से इस बारे में पूछा तो वे बोलीं—हमें अल्लाह कुछ नहीं होने देगा। कोरोना तो मोदी को होगा। इसी तरह एक भूतपूर्व चुनाव आयुक्त ने कहा कि भगवान करे मोदी को कोरोना हो जाए। गृहमंत्री अमित शाह के लिए एक महिला पत्रकार ने कैंसर होने की जैसी दुआ मांगी। इसी तरह हाल ही में जब संबित पात्रा कोरोना के शक में अस्पताल में दाखिल हुए, तो लोग सोशल साइट्स पर जैसे उनके बीमार होने की खुशियां मनाने लगे। तरह-तरह के चुटकुले लिखने लगे। कार्टून बनाने लगे। किसी के मरने की कामना करना, किसी की बीमारी के लिए दुआ मांगना, किसी के बीमार होने पर हंसना, खुशियां मनाना, आज़ादी के नाम पर समाज में इस तरह की गिरावट इससे पहले आपने कब देखी। इन बातों से पता चलता है कि हमारे समाज का कितना पतन हो चुका है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं, क्या वे अमृत खाकर आए हैं। क्या मृत्यु और बीमारियां कभी उनका दरवाजा नहीं खटखटाएंगी। क्या वे इन सब बातों से बचे रहेंगे।

भगवान बुद्ध और उस बुढिय़ा की कहानी आपको याद है। जहां अपने बेटे की मृत्यु से दुखी होकर एक बुढिय़ा भगवान बुद्ध के पास पहुंची और अपने बेटे को जीवित करने की प्रार्थना करने लगी। तब बुद्ध ने कहा कि वह एक कटोरा आटा किसी ऐसे घर से मांग कर लाए, जहां कभी मौत न आई हो। बुढिय़ा को एक भी घर ऐसा न मिला और वह खाली हाथ लौट आई। इस कहानी का सबक यही है कि मृत्यु और बीमारियों से संसार में कोई नहीं बचा है। चाणक्य ने एक बार कहा था कि मनुष्य को अपने धन और स्वास्थ्य पर कभी घमंड नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्या पता कब धन नष्ट हो जाए और कब गरीबी आ जाए। और कब कोई बीमारी शरीर में लग जाए। लेकिन आज के सोशल मीडिया वीर शायद इन बातों की तरफ कभी ध्यान नहीं देते हैं। वे सिर्फ और सिर्फ दूसरों का बुरा और गिरना ही क्यों देखना चाहते हैं।

आप किसी के विचारों से असहमत हो सकते हैं। राजनीतिक रूप से उसका विरोध कर सकते हैं, विरोधी के खिलाफ चुनाव लड़ सकते हैं। मगर अपने विरोधी से इतनी नफरत कि हम बस उसका बुरा ही बुरा चाहें, यह कितना शर्मनाक है।

अटल बिहारी वाजपेयी पंडित जवाहर लाल नेहरू के विचारों का अक्सर विरोध करते थे, लेकिन नेहरू जी की मृत्यु पर उन्होंने जो भाषण दिया, वह अभूतपूर्व है। इसी तरह अटल जी और राजीव गांधी भी एक-दूसरे के विरोधी थे, लेकिन जब राजीव गांधी को पता चला कि अटल जी को गुर्दे की समस्या है। उसका इलाज विदेश में ही हो सकता है तो राजीव गांधी अपने विदेश दौरे में अटल जी को साथ ले गए और उनका इलाज कराया। बाद में वाजपेयी जी ने कहा भी कि आज वह राजीव गांधी की वजह से ही जिंदा हैं।

स्वर्गीय चंद्रशेखर श्रीमती इंदिरा गांधी के विचारों के बहुत विरोधी थे। लेकिन जब संजय गांधी की मृत्यु हुई, तो वह भागे-भागे अस्पताल पहुंचे। उन्होंने बताया था कि समझ में नहीं आ रहा था कि वह इंदिरा जी का सामना कैसे करेंगे। ये लोग इसी देश के नेता थे। एक-दूसरे के विचारों के विरोधी थे, लेकिन वे अपने विरोधी को नेस्तनाबूद नहीं करना चाहते थे। क्या इन नेताओं से कुछ सीखा जा सकता है।

वरना तो वह दिन दूर नहीं जब अपने देश में भी सोशल मीडिया की दूसरे को लांछित करने की आज़ादी के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ेगा। निश्चय ही यह किसी के लिए अच्छा नहीं होगा। सोशल मीडिया पर यदि लोगों को अपनी आज़ादी चाहिए, तो उन्हें दूसरों की आज़ादी की भी कद्र करनी होगी।

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