आगे का अमेरिका


आखिर जोसफ बाइडन अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति निर्वाचित हो गए। बहुमत के लिए उन्हें इलेक्टोरल कॉलेज के 270 वोटों की जरूरत थी। ट्रंप खेमे की तमाम रोकटोक, मुकदमेबाजी और दोबारा गिनती के बावजूद यह रेखा वह आराम से पार कर गए। आम मतदाताओं के 7.4 करोड़ वोट बाइडन को मिले जो अमेरिका के इतिहास में सबसे ज्यादा है। बावजूद इसके, रूस ने अभी तक उनको बधाई नहीं दी है। चीन ने भी यह कहते हुए बधाई देने में जल्दबाजी से बचना चाहा है कि नतीजे अभी स्पष्ट नहीं हुए हैं। अमेरिका ही नहीं, दुनिया के लिए भी यह असमंजस आशंकाएं पैदा कर रहा है। यों भी ट्रंप का कार्यकाल उनकी कभी कुछ भी बोल या कर देने की छवि से आक्रांत रहा है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट में चुनौती देने से चुनाव नतीजों पर कोई असर नहीं पडऩा है क्योंकि ट्रंप के आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

फिर भी यह तो है कि इस बार अमेरिका में सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया उतनी सहज नहीं रहने वाली, जितनी हर बार होती है। चिंता की एक और वजह यह है कि नियमत: ट्रंप दो महीने और राष्ट्रपति पद पर बने ही रहने वाले हैं। नए राष्ट्रपति का शपथग्रहण 20 जनवरी को होता है। जो सवाल सबके मन को मथ रहा है, वह यह कि इस बीच ट्रंप पता नहीं क्या फैसला करके आने वाली सरकार के लिए किस तरह की मुश्किल खड़ी कर दें। अंतरराष्ट्रीय मामलों में, खासकर चीन के संदर्भ में उनका कोई विवादित फैसला अगली सरकार की मुसीबत बढ़ा सकता है। हालांकि बाइडन के सामने चुनौतियां यों भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती तो कोरोना महामारी से निपटने की ही है जो ट्रंप सरकार की गलत प्राथमिकताओं के चलते अमेरिका में बेकाबू हो गई है और कई देशों में उसकी दूसरी लहर चल पड़ी है। बीमारी के बजाय विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) को निशाना बनाने से न केवल कोरोना से लड़ाई कमजोर पड़ी, बल्कि दुनिया में अमेरिका की छवि को भी नुकसान पहुंचा। ऐसा ही नुकसान पेरिस जलवायु समझौते और अन्य अंतरराष्ट्रीय समझौतों से एकतरफा ढंग से बाहर आने से भी हुआ।

जाहिर है, बाइडन के नेतृत्व में बनने वाली सरकार को इन तमाम नुकसानों की भरपाई के लिए काफी मशक्कत करनी होगी। अर्थव्यवस्था की तबाह हालत इस काम को बेहद कठिन बना देती है, फिर भी यह सबसे बड़ी चुनौती नहीं है। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि साइंस-टेक्नॉलजी के मोर्चे पर अमेरिका की सर्वोच्चता खतरे में है। टेलिकॉम में 5जी में बढ़त बनाकर चीन ने लीड ले ली है। इस मोर्चे पर अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि दुनिया भर की प्रतिभाएं वहां पहुंचकर उसे अपनी सेवाएं देने को तत्पर रही हैं। मगर पिछले कुछ वर्षों की संकीर्णता और एंटी माइग्रैंट फैसलों ने भारत जैसे तमाम देशों के स्टूडेंट्स के मन में अमेरिका के प्रति आशंकाएं पैदा की हैं। बाइडन प्रशासन को इन सारे मोर्चों पर बहुत मेहनत करनी होगी।

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