• dainik kshitij kiran

अंधेरे दौर की उलझनें


निस्संदेह मानवीय स्मृतियों में ऐसे समय की याद नहीं है कि जब लोगों को तमाम बंदिशों के बीच जीना पड़ा हो और इनसान, इनसान से कतराता हुए एकाकी जीवन के दंश झेल रहा हो। कोरोना संक्रमण का खतरा अपनी जगह है, मगर उससे बचाव के लिए जो सुरक्षात्मक उपाय किये गये हैं, उनके घातक परिणाम सामने आने लगे हैं। पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के एक सरकारी कर्मचारी द्वारा अपनी सहकर्मी को निर्ममता से पीटे जाने का वीडियो वायरल हुआ। विडंबना यह है कि महिला कर्मचारी दिव्यांग थी और पुरुष कर्मचारी को मास्क पहनने को कह रही थी। यह वीडियो वायरल होने के बाद कर्मचारी को गिरफ्तार करके निलंबित कर दिया गया है। यह मात्र एक घटना है, पूरे देश का आंकड़ा डराने वाला है लोग अवसाद, तनाव, भविष्य के प्रति अनिश्चितता और कोरोना संक्रमण के भय से आक्रामक व्यवहार कर रहे हैं। लॉकडाउन के शुरुआती दौर में कई लोगों ने महज इसलिए आत्महत्या कर ली कि उन्हें शराब नहीं मिली। ऐसे देश में जहां लोग मानसिक रोगों को शर्म का विषय मानकर डॉक्टरों के पास जाने से भी कतराते हैं, वहां इस रोग का प्रसार भयावह रूप में हुआ है। कोरोना काल का साइड इफेक्ट है अवसाद और मानसिक रोग। भारतीय मनोचिकित्सक सोसायटी दावा कर रही है कि लॉकडाउन के शुरुआती दौर में ही मानसिक रोगों में बीस फीसदी की वृद्धि हुई। जैसे-जैसे लॉकडाउन और उससे जुड़ी बंदिशें बढऩे लगीं, असुरक्षा व अकेलेपन की वजह से समस्या और जटिल होती चली गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट बताती है कि एक सौ तीस करोड़ की आबादी में करीब नौ करोड़ लोग मानसिक अवसाद के दौर से गुजर रहे हैं। संगठन ने आशंका जतायी है कि वर्ष के अंत तक यह संख्या बीस फीसदी तक भी हो सकती है। विडंबना यह है कि देश में करीब नौ हजार के करीब ही मनोचिकित्सक हैं यानी हर एक लाख व्यक्ति पर मात्र एक ही चिकित्सक उपलब्ध है।

दरअसल, लगातार भयावह होते कोरोना संक्रमण ने देश की अधिकांश जनता को गहरे तक प्रभावित किया है। किसी के सामने रोजगार की चिंता है, कोई एकाकीपन से जूझ रहा है। बीमारी के भय से एक बड़ा वर्ग आशंकित है। लगातार हाथ धोने से तमाम लोगों को कोरोनाफोबिया हो गया है। सामान्य खांसी-जुकाम के लक्षण होने पर बीमारी होने का भय होने लगा है। बदलते मौसम चक्र में जो सामान्य रोग हुआ करते थे, वे आज भय के प्रतीक बन गये। भीड़ से लोगों को भय होने लगा है। ऐसे में कोई छींक दे या खांस दे तो वह हरेक की निगाह में आ जाता है। कई तरह के भय लोगों के दिमाग में हैं। यह बीमारी कब तक रहेगी। कब इसका वैक्सीन आयेगा। सचमुच कोरोना संकट ने मनुष्य की दुश्वारियों का अंतहीन सिलसिला शुरू कर दिया है। लगातार घर में बने रहने के कारण लोगों का स्वाभाविक जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। छोटी-छोटी बातों पर झुंझलाना और जरा-सी बात का तिल का ताड़ बन जाना आम बात हो गई है जो कालांतर अवसाद को जन्म देता है, जिससे परिवार के रिश्तों में एक अलग किस्म का तनाव पैदा हो जाता है। जो लोग क्वारंटाइन में होते हैं उन्हें यह जीवन कैदी जैसा लगता है। फिर ऐसे में वाकई किसी को कोविड-19 हो जाए तो उसे सामाजिक कलंक समझने वालों की संख्या भी कम नहीं है। नि:संदेह बड़ी संख्या में लोगों के रोजगार छिने हैं, तो कुछ भविष्य की चिंताओं में लिप्त हैं। कुछ के लिए अकेलापन अलग किस्म का कष्ट है। वर्चुअल दुनिया में मस्त रहने वाले और घर-परिवार से दूर लोग पहले भी एकाकी जीवन जी रहे थे, लेकिन समाज ने इस मुश्किल दौर में एकाकीपन महसूस किया, जिसने समाज में समरस रिश्तों की जरूरत बतायी है। समस्या का समाधान रिश्तों की सरसता में है, सकारात्मक सोच में है, रचनात्मक ऊर्जा को जगाने में है। यह वक्त भी निकल जायेगा।

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