असम: लॉकडाउन में हादसे

असम के तिनसुकिया जिले के एक तेल कुएं में लगी आग उस पूरे इलाके के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द साबित हो रही है। आग इतनी भयंकर है कि दस किलोमीटर दूर से इसकी लपटें देखी जा सकती हैं। विशाल हरा-भरा इलाका काले धुएं से भर गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस पर काबू पाने में कम से कम चार हफ्ते लगेंगे। याद रहे, यह कोई आकस्मिक हादसा नहीं है। 27 मई को इसी तेल कुएं में एक विस्फोट हुआ था जिसके बाद से वहां गैस लीक हो रही थी। इससे न सिर्फ यहां के लोगों का बल्कि वन्य जीवों का भी जीना हराम हो गया था। आसमान से तेल की बारिश सी हो रही थी, जिससे जल स्रोत प्रदूषित हो रहे थे। मरी डॉल्फिनें नदी में उतराई दिख रही थीं।

अब 15 दिन बाद इसकी परिणति समूचा तेल कुआं ही धधक उठने के रूप में हुई है। आगे कम से कम एक महीने और जलने वाली यह आग यहां के पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचाएगी, कहा नहीं जा सकता। मगर हाल के दिनों में जनमानस को उद्वेलित करने वाला यह कोई अकेला औद्योगिक हादसा नहीं है। बमुश्किल हफ्ता भर पहले गुजरात के भरूच शहर में एक केमिकल फैक्ट्री का बॉयलर फट जाने से आठ मजदूर मारे गए और 57 लोग बुरी तरह घायल हुए। उससे पहले मई में ही विशाखापत्तनम की एक पॉलिमर कंपनी से रिसी जहरीली गैस के असर में जिस तरह लोग बेहोश होते, लुढक़ते दिखने लगे, उसे भुलाना मुश्किल है।

जांच-पड़ताल में इन तमाम हादसों के पीछे अलग-अलग वजहें खोजी जा सकती हैं, लेकिन एक बात इनमें साझा है कि ये हादसे ऐसे समय में हुए जब देश कोरोना वायरस और लॉकडाउन का सामना कर रहा है। तमाम कल-कारखाने पहले लॉकडाउन की वजह से तुरत-फुरत बंद करने पड़े, फिर मजदूरों के गांव चले जाने से आधे-तिहाई स्टाफ के साथ उन्हें खोलना पड़ रहा है। ध्यान रहे, मजदूर शब्द से एकबारगी जिन ईंट ढोते या बोझा उठाते श्रमिकों की तस्वीर मन में उभरती है, उससे इस वर्कफोर्स के कौशल का अंदाजा नहीं मिलता। औद्योगिक काम संभालने वाले ज्यादातर मजदूर किसी खास काम में माहिर होते हैं। उन्हें तत्काल रिप्लेस करना किसी भी मैनेजमेंट के बूते से बाहर है।

ताजा ट्रेंड कंपनियों में कम से कम कर्मचारी रखने का है। नतीजा यह कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते मजदूरों के पलायन से बने शून्य को भरना सारे ही उद्यमों के प्रबंधन के लिए लोहे के चने चबाने जैसा है। सारे काम इस जटिलता का आकलन करने के बाद ही शुरू किए जाने चाहिए, वरना आने वाले दिनों में कुछ और दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं का साक्षी होना पड़ सकता है। कुछ दिन पहले मुंबई के चेंबूर इलाके में गैस लीक की खबरों से लोगों में फैला आतंक इसी आशंका की एक बानगी है। वक्त का तकाजा है कि कंपनियों का प्रबंधन और सरकारें हर तरह के सुरक्षा उपाय सुनिश्चित करने के साथ ही मजदूरों को गांव से वापस लाने की गंभीर कोशिशें शुरू करें।

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