अमीरी से खतरा


कोरोना के प्रकोप से जूझ रही दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा यह वायरस नहीं बल्कि हर किसी के मन में उछाल मार रही अमीरी की ललक है। मजेदार बात यह कि ऐसा वीतरागी निष्कर्ष किसी आध्यात्मिक गुरु या साधु-संत का नहीं बल्कि दुनिया के कुछ जाने-माने वैज्ञानिकों का है। इससे भी बड़ी बात यह कि ऑस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड और ब्रिटेन के पर्यावरण वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा की गई यह स्टडी वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम द्वारा प्रायोजित है, जो खुद दुनिया के सबसे अमीर देशों का वैचारिक मंच है।

पर्यावरण के बिगड़ते हालात पर चिंता पिछले कुछ दशकों में बढ़ती गई है। लगातार यह कहा जाता रहा है कि पृथ्वी को अगर एक जिंदा ग्रह बनाए रखना है तो मानव समाज को अपनी प्राथमिकता बदलनी होगी। लेकिन ये बातें प्राय: नैतिकतावादी आग्रह के ही रूप में आती रहीं। प्राथमिकताएं तय करने का अधिकार जिन लोगों के हाथों में था, उन्होंने कभी ‘लिप सर्विस’ से आगे बढऩे की जरूरत नहीं महसूस की। ज्यादातर एक-दूसरे पर दोष मढक़र ही काम चलाते रहे। बल्कि कई राष्ट्राध्यक्ष इस बीच ऐसे भी हुए जिन्होंने पर्यावरण संबंधी चिंताओं को यूं ही खड़ा किया जा रहा हौआ बताया और इन्हें सिरे से नकार दिया।

बहरहाल, अभी ऐसा लग रहा है कि जो काम प्रदूषित होती हवा, जीव-जंतुओं की विलुप्त होती प्रजातियां और वातावरण में बढ़ती गर्मी नहीं कर सकी, उसे कोरोना वायरस ने एक ही झटके में संपन्न कर डाला। इस संकट ने न केवल आम लोगों को बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में निर्णायक स्थानों पर बैठे लोगों को भी उद्वेलित कर दिया। कई तरफ से यह बात सामने आने लगी कि अपने जीवन को अधिक से अधिक सुविधासंपन्न बनाने के क्रम में हमने अन्य जीव जंतुओं के लिए कोई सुकून की जगह ही नहीं छोड़ी है। उनके जीवन में लगातार बढ़ता हमारा दखल खतरनाक वायरसों के उभार का कारण बन रहा है।

जिस वैज्ञानिक रिपोर्ट का हम यहां जिक्र कर रहे हैं, उसमें स्पष्ट कहा गया है कि अगले दस वर्षों में दुनिया के नष्ट होने का सबसे बड़ा खतरा परमाणु युद्ध से नहीं बल्कि लोगों की अधिक से अधिक उपभोग करने की इच्छा से है। लेकिन समस्या यह है कि इसी इच्छा का संगठित रूप वह कंज्यूमरिज्म है, जो पिछले कुछ दशकों के आर्थिक विकास का मुख्य प्रेरक तत्व रहा है।

वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम जैसे मंचों ने कंज्यूमरिज्म के ग्लोबल इंजन जैसी भूमिका निभाई है और हर तरह से इसे प्रोत्साहित किया है। लेकिन यही वर्ल्ड इकॉनमिक फोरम आज आर्थिक विकास की गति और दिशा में अपेक्षित बदलाव सुनिश्चित करने वाले ढांचागत सुधार की बात कर रहा है। फोरम के फाउंडर और एक्जीक्युटिव चेयरमैन क्लॉस श्वैब कोरोना महामारी की पृष्ठभूमि में पूंजीवाद को नए सिरे से ढालने की जरूरत बता चुके हैं। उम्मीद करें कि इस बार ये बातें महज बातों तक सिमटकर नहीं रह जाएंगी। इन्हें जमीन पर उतारा जाएगा, ताकि पृथ्वी के सभी जीव-जंतुओं के लिए बेहतर भविष्य सुनिश्चित हो सके।


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