अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव: किताब का इतना खौफ


इसी साल नवंबर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव जैसे-जैसे करीब आ रहे हैं, दोनों पक्षों की गहमागहमी बढ़ती जा रही है। ऐसे में दो पुस्तकों ने जिस तरह से सबका ध्यान अपनी तरफ खींच रखा है, वह काफी दिलचस्प है। इन दोनों किताबों का प्रकाशन रोकने की पूरी कोशिश राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ओर की गई लेकिन पहले पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन की किताब ने अदालती लड़ाई जीती और फिर इसी सप्ताह ट्रंप की भतीजी मैरी ट्रंप की लिखी किताब का भी बाजार में आना तय हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में विवादों, घोटालों और रहस्योद्घाटनों की खासी भूमिका रहती आई है। शायद ही कोई चुनाव हो जिसमें तरह-तरह के सनसनीखेज खुलासे सामने न आते हों।

2016 के चुनावों को याद करें तो डॉनल्ड ट्रंप और हिलैरी क्लिंटन, दोनों को तरह-तरह के आरोप झेलने पड़े थे। खासकर ट्रंप के संकुचित विचारों और रंगीनमिजाजी को लेकर इतने रहस्योद्घाटन सामने आए कि उसके बाद भी कुछ बचा रह गया होगा, सोचना मुश्किल है। लेकिन राजनीति में हर दिन एक नया दिन होता है। यह तो फिर भी नया चुनाव है। जाहिर है, एक बार फिर लोगों को अपने वोट का इस्तेमाल करना है तो नए सिरे से उन्हें प्रत्याशियों की अच्छाई-बुराई समझाने का सिलसिला शुरू हो रहा है। इसी क्रम में इन दोनों पुस्तकों के प्रकाशित होने की बात आई तो राष्ट्रपति ट्रंप की इन पर रोक लगवाने की कोशिशों ने सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। अमेरिकी राष्ट्रपति अगर कुछ छुपाना चाहते हैं तो यह लोगों की उत्सुकता जगाने वाला सबसे बड़ा कारक बन जाता है। लेखकों की पृष्ठभूमि इस पर और मसाला छिडक़ने वाली है। मैरी ट्रंप डॉनल्ड की भतीजी (उनके सौतेले भाई की बेटी) हैं। वह भी ट्रंप परिवार में ही पली-बढ़ी हैं। डॉनल्ड ट्रंप को दुनिया का सबसे खतरनाक आदमी बताते हुए उन्होंने अपनी पुस्तक का शीर्षक रखा है ‘टू मच एंड नेवर एनफ : हाउ माई फैमिली क्रिएटेड द वर्ल्ड्स मोस्ट डैंजरस मैन’।

खबरें बताती हैं कि इसमें अन्य बातों के अलावा यह भी कहा गया है कि कैसे डॉनल्ड के पिता और खुद डॉनल्ड ईमानदारी से टैक्स भरने को बेवकूफी मानते थे। जॉन बोल्टन ने भी ट्रंप को बतौर राष्ट्रपति करीब से देखा है। खबरों के मुताबिक उनकी पुस्तक ‘द रूम व्हेयर इट हैपेंड’ में बताया गया है कि कैसे राष्ट्रपति ट्रंप विदेशी राष्ट्राध्यक्षों से चुनाव जीतने में मदद मांगते रहे हैं। उन्होंने चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग से चीन की आर्थिक ताकत का हवाला देते हुए कहा था कि वे उनकी (ट्रंप की) जीत सुनिश्चित कर सकते हैं। बहरहाल, इन पुस्तकों का मतदाताओं के दिलोदिमाग पर कितना और कैसा असर पड़ता है, यह साफ होने में वक्त लगेगा। फिलहाल यही कहा जा सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया के इस युग में अमेरिकी चुनाव किताबों के लिए एक बड़ा मोरेल बूस्टर हैं।

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