अमृत तुल्य है संकट में मिलने वाली मदद


योगेन्द्र नाथ शर्मा 'अरुण

समाज का आधार परस्पर एक-दूसरे की सहायता करना ही रहा है। यह सच है कि परिस्थितियों में घिरकर आदमी कभी-कभी इतना असहाय हो जाता है कि वह उस समय किसी की मदद के लिए तरसता है। अगर उस समय आदमी को वांछित मदद मिल जाती है तो आदमी संकट पर विजय पा लेता है और उसके हृदय में अपने मददगार के लिए कृतज्ञता का भाव बना रहता है।

महाकवि जयशंकर प्रसाद की विश्वकृति 'कामायनी के 'चिंता सर्ग में महाप्रलय के पश्चात जीवित बचे मनु जब यज्ञ के बाद प्रसाद रूप में कुछ हविष्य इसलिए छोड़ देते हैं कि शायद कोई दूसरा प्राणी मेरी ही तरह प्रलय से बच गया हो तो इस हविष्य को खाकर अपनी प्राण-रक्षा तो कर सकेगा? सच मानिए, कामायनी का यही सत्य मानव-समाज का वह शाश्वत सत्य है, जिसके आधार पर समाज पाषाण-युग से निकलकर आज के सभ्य युग तक पहुंच पाया है। किसी कवि ने कहा है-

संकट में हो मित्र तो, करो तुरंत सहाय।

बाधा पल में दूर हो, लक्ष्य सदा मिल जाय।

आज एक ऐसी प्रेरक घटना पढऩे को मिली। यह घटना श्रीमती सुधा मूर्ति की पुस्तक 'द डे आई स्टॉप्ड ड्रिंकिंग मिल्कÓ से ली गई है। मुंबई से बेंगलुरू जा रही ट्रेन में सफऱ के दौरान टीसी ने सीट के नीचे छिपी लगभग तेरह/चौदह साल की एक लड़की को देखकर पूछा-तुम्हारा टिकट कहां है? तो कांपती हुई लड़की बोली-टिकट तो नहीं है साहब।

गुर्राता हुआ टीसी बोला-तो गाड़ी से नीचे उतरो। तभी एक स्वर गूंजा-इसका टिकट मैं दे रही हूं। उसी डिब्बे में सफर कर रही एक यात्री ऊषा भट्टाचार्य की यह आवाज थी, जो पेशे से प्रोफेसर थी। सहमी लड़की से ऊषा जी ने पूछा-तुम्हें कहां जाना है बेटी? लड़की बोली-पता नहीं है मैम! ऊषा जी बोली-तब तो तुम मेरे साथ चलो बैंगलोर तक! और प्यार से उन्होंने पूछा-तुम्हारा नाम क्या है? मासूम सा उत्तर आया -चित्रा

बैंगलोर पहुंच कर ऊषाजी ने चित्रा को अपनी जान-पहचान की एक स्वयंसेवी संस्था को सौंप दिया और एक अच्छे स्कूल में उसका एडमिशन करवा दिया। जल्द ही ऊषा जी का ट्रांसफर दिल्ली हो गया, जिस कारण चित्रा से ऊषा जी का संपर्क टूट गया। कभी-कभार केवल फोन पर बात हो जाया करती थी।

करीब बीस साल बाद ऊषाजी को एक लेक्चर के लिए सेन फ्रांसिस्को (अमेरिका) बुलाया गया। लेक्चर के बाद जब वह होटल का बिल देने रिसेप्शन पर गई तो उन्हें पता चला कि एक दंपति ने उनके होटल का बिल चुका दिया था। अचंभित सी ऊषा जी ने बिल चुकाने वाली महिला से पूछा- तुमने मेरा बिल क्यों भरा है? प्यारी सी मुस्कान के साथ उत्तर मिला-मैम, यह बिल मुम्बई से बैंगलोर तक के रेल टिकट के सामने तो कुछ भी नहीं है। चौंक कर ऊषाजी बोली-अरे चित्रा! तुम? और उन्होंने चित्रा को गले लगा लिया। चित्रा कोई और नहीं, बल्कि प्रसिद्ध इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरमैन सुधा मूर्ति थीं, जो इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति की पत्नी हैं।

सच मानिए, कभी-कभी आपके द्वारा की गई किसी की सहायता, किसी का जीवन बदल सकती है।

यदि जीवन में कुछ कमाना है, तो पुण्य अर्जित कीजिये, क्योंकि यही वो मार्ग है, जो स्वर्ग तक जाता है।

आज हम जिस भौतिकता के वातावरण में जी रहे हैं, उसमें हमारी मानवीय संवेदनाएं जाने क्यों मर गई हैं। सबसे बड़ी बात तो यह हुई है कि हमारे दिलों में एक-दूसरे के लिए विश्वास ही खत्म सा हो गया है? हमें कोई व्यक्ति ऐसा मिलता है, जिसे हमारी सहायता जीवन के लक्ष्य को पूरा कराने में सहायक हो सकती है, तो भी हम जाने क्यों, उसकी मदद नहीं कर पाते?

कभी मैंने लिखा था-

हर तरफ वीरानगी सी उड़ रही है,

यंत्र जैसी जि़न्दगी बस हो गई है।

आदमी और आदमी के बीच फैली दूरियां,

खोखली मुस्कान फैशन हो गई है।

आइए, आज एक संकल्प हम सब मिलकर लें कि हम किसी व्यक्ति की तात्कालिक मदद करके उसे कष्टों से बाहर अवश्य ही निकालेंगे। सच मानिए, हम अगर संकट में हों, तो किसी की मदद की जैसी जरूरत हमें होती है, उसी का ध्यान करके हम किसी की मदद को आगे आएंगे, तो सचमुच हम समाज-ऋण से मुक्त हो सकेंगे। याद कीजिए एक गीत की ये पंक्तियां-

साथी हाथ बढ़ाना,

एक अकेला थक जाएगा,

मिलकर बोझ उठाना।


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