अब खेतों में भी उगेगी वैक्सीन



मुकुल व्यास

चौंकिए मत। वैज्ञानिक ऐसी वैक्सीन बना रहे हैं जिन्हें खेतों में उगाया जा सकेगा और खाद्य वस्तुओं की तरह खाया जा सकेगा। अमेरिका में रिवरसाइड स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (यूसीआर) के वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या लेटस (सलाद) पत्तों को एमआरएनए वैक्सीन की फैक्टरियों में बदला जा सकता है। कोविड वैक्सीनों में प्रयुक्त मैसेंजर आरएनए या एमआरएनए टेक्नोलॉजी में मुख्य रूप से कोशिकाओं को रोगाणुओं को पहचानने और संक्रामक रोगों से बचाव करने के बारे में शिक्षित किया जाता है। इस टेक्नोलॉजी के प्रयोग में सबसे बड़ी चुनौती इसे परिवहन और स्टोरेज के दौरान ठंडा रखने की है। वैक्सीन के स्थायित्व के लिए निम्न तापमान जरूरी है। यदि विज्ञानियों का नया प्रोजेक्ट सफल हो जाता है तो पौधों पर आधारित खाने योग्य एमआरएनए वैक्सीन इस समस्या को दूर कर सकती है। इस तरह की वैक्सीनों को कमरे के तापमान पर स्टोर किया जा सकता है।

अमेरिका की नेशनल साइंस फाउंडेशन से पांच लाख डॉलर के अनुदान से शुरू किए गए प्रोजेक्ट के तीन मुख्य उद्देश्य हैं। पहला, क्या एमआरएनए से युक्त डीएनए को पौधे की कोशिकाओं के उस हिस्से में पहुंचाया जा सकता है जहां वह रिप्लीकेट कर सके। दूसरा, यह सिद्ध करना कि पौधे एक पारंपरिक वैक्सीन की बराबरी करने के लिए समुचित एमआरएनए उत्पन्न कर सकते हैं और तीसरा, पौधा आधारित वैक्सीन की सही खुराक का निर्धारण। यूसीआर में वनस्पति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर जुआन पाब्लो गिराल्डो ने कहा कि एक पौधे द्वारा उत्पादित एमआरएनए से एक व्यक्ति को वैक्सीन की खुराक दी जा सकेगी। गिराल्डो इस शोध का नेतृत्व कर रहे हैं। इस शोध में सेन डियागो स्थित कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय और कार्नेगी मेलन विश्वविद्यालय के विज्ञानी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि हम पालक और लेटस के साथ नयी टेक्नोलॉजी का परीक्षण कर रहे हैं। हमारी कोशिश यह रहेगी कि लोग आगे चल कर अपने बगीचों में ही वैक्सीन के पौधे उगाएं।

भविष्य में किसान भी अपने सारे खेत में वैक्सीन वाले पौधे उगा सकते हैं। इस टेक्नोलॉजी में सबसे अहम भूमिका पौधे की कोशिकाओं में पाए जाने वाले क्लोरोप्लास्ट की है। क्लोरोप्लास्ट सूरज की रोशनी को ऊर्जा में बदल देते हैं, जिसका प्रयोग पौधा करता है। ये दरअसल सौर ऊर्जा से चलने वाली सूक्ष्म फैक्टरियां हैं जो शुगर और दूसरे मॉलिक्यूल उत्पन्न करती हैं, जिनसे पौधे का विकास होता है। इन फैक्टरियों का प्रयोग वांछित मॉलिक्यूल उत्पन्न करने के लिए भी किया जा सकता है। पिछले अध्ययनों में गिराल्डो यह दर्शा चुके हैं कि क्लोरोप्लास्ट ऐसे जीनों को अभिव्यक्त कर सकता है जो स्वाभाविक रूप से पौधे का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने और उनके सहयोगियों ने पौधों की कोशिकाओं में बाहरी आनुवंशिक सामग्री भेज कर ऐसा कर दिखाया। अपने प्रोजेक्ट के लिए उन्होंने नैनो इंजीनियरिंग की प्रोफेसर निकोल स्टीनमर्ट्ज से सहयोग लिया। स्टीनमर्ट्ज और उनके सहयोगियों ने आनुवंशिक सामग्री को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने के लिए नैनो टेक्नोलॉजी विकसित की है। स्टीनमर्ट्ज ने बताया कि हम पौधों में जीन पहुंचाने के लिए पौधों के वायरसों का प्रयोग करना चाहते हैं जो कुदरती रूप से पाए जाने सूक्ष्म कण अथवा नैनो पार्टिकल हैं। इन वायरसों को क्लोरोप्लास्ट में पहुंचाने और उन्हें पौधों के प्रति असंक्रामक बनाने के लिए कुछ तकनीकी फेरबदल की जरूरत पड़ती है।

कुछ वैज्ञानिकों का ख्याल है कि हमें पौधों पर आधारित वैक्सीन विकसित करने के लिए अधिक प्रयास करने चाहिए। कनाडा में क्यूबेक स्थित लवाल विश्वविद्यालय के दो शोधार्थियों, फास्टर-बोवेंडो और गेरी कोबिंगर का कहना है कि इस तरह की वैक्सीन 'मॉलिक्यूलर फार्मिंगÓ के जरिए बनाई जा सकती है। इस विधि में पौधे की कोशिका में डीएनए रखा जाता है जो प्रोटीन बनाता है। इस कोशिका का उपयोग वैक्सीन बनाने के लिए किया जाता है। वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त वैक्सीनों के अलावा और अधिक प्रभावी वैक्सीन की तलाश में जुटे हुए हैं। उनकी कोशिश एक ऐसी समग्र वैक्सीन विकसित करने की है जो सभी तरह के कोरोना वायरसों के खिलाफ प्रभावी सिद्ध हो।

वैक्सीनें आम तौर पर बैक्टीरियाई सिस्टम में उत्पन्न की जाती हैं और वे बहुत असरदार साबित हुई हैं। ऐसे सिस्टम को बायोरिएक्टर भी कहा जाता है। ऐसी वैक्सीनों की उत्पादन लागत बहुत ज्यादा होती है। वैक्सीन की बायोमैन्युफैक्चरिंग के विकल्प के तौर पर वैज्ञानिकों ने 1986 में मॉलिक्यूलर फार्मिंग का प्रस्ताव रखा था। इसके लिए वैज्ञानिकों को सिर्फ ग्रीनहाउस सेटअप की आवश्यकता पड़ती है जो बायोरिएक्टरों की तुलना में बहुत सस्ते पड़ते हैं। रिसर्चरों का कहना है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन बनाना सस्ता पड़ेगा और इसके दूसरे लाभ भी होंगे। एक बहुत बड़ा फायदा यह है कि इस तरह की वैक्सीन बनाने के लिए संसाधनों की तलाश पर अधिक ध्यान नहीं देना पड़ेगा। वैक्सीनों को बायोरिएक्टरों में तैयार करने के बजाय खेतों की फसलों में उत्पन्न किया जा सकता है। दूसरा बड़ा फायदा यह है कि पौधे मानव रोगाणुओं द्वारा संक्रमित नहीं हो सकते। इसके अलावा पिछली रिसर्च से पता चलता है कि पौधों पर आधारित वैक्सीन दूसरी विधियों से तैयार वैक्सीनों की तुलना में ज्यादा मजबूत इम्यून रेस्पांस उत्पन्न करती हैं। सामान्य विधियों की तुलना में पौधों पर आधारित वैक्सीन का उत्पादन ज्यादा होता है।

इस समय गौशे रोग के इलाज के लिए इस तरह की वैक्सीन का उत्पादन किया जा रहा है। लीवर और स्प्लीन जैसे शरीर के कुछ अंगों में वसायुक्त पदार्थों के जमाव से गौशे रोग उत्पन्न होता है। इन पदार्थों के जमा होने से इन अंगों का आकार बढ़ जाता है, जिसकी वजह से उनके कार्यों पर असर पड़ता है। वसायुक्त पदार्थ हड्डियों के ऊतकों में भी जमा होने लगते हैं, जिनसे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। गौशे रोग के इलाज में प्रयुक्त होने वाला ग्लूकोसेरिब्रोसिडेस नामक एंजाइम गाजर की सेल कल्चर में उत्पन्न होता है।

अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) के अनुसार फ्लू वैक्सीनों के निर्माण के लिए सबसे ज्यादा प्रचलित विधि में अंडा-आधारित विधि का प्रयोग किया जाता है। यह विधि 70 साल पुरानी है। दुनिया में कोरोना महामारी फैलने से पहले इन्फ्लुएंजा की वनस्पति-आधारित वैक्सीन का तीसरे चरण का ट्रायल शुरू हो चुका था और उसके उत्साहवर्धक नतीजे सामने आए थे। इस समय एक रिसर्च टीम कोविड-19 के लिए वनस्पति आधारित वैक्सीन पर काम कर रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि औषधियों के नियमन के लिए जिम्मेदार सरकारी संस्थाओं को वनस्पति-आधारित वैक्सीन के लाभों को समझना चाहिए ताकि इन्हें अपनाने के लिए उचित दिशा-निर्देश तैयार किए जा सकें।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।



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