अब की बार मेहनतकशों की ‘काम वापसी’

क्षमा शर्मा


आज मशहूर लेखक राजेंद्र राव जी से बात हुई। करीब महीनेभर पहले भी हुई थी। विषय था—मजदूरों की वापसी। तब उन्होंने कहा था कि सारी गाडिय़ां भरकर जा रही हैं। मजदूर वापस जा रहे हैं। वे गांवों की तरफ आए थे, लेकिन जल्दी ही उन्हें पता चल गया कि यहां आसानी से गुजर-बसर होना मुश्किल है।

आज बातचीत में उन्होंने और दिलचस्प बातें बताईं। कहा कि कानपुर में लॉकडाउन के बाद जब फैक्टरियां खुली हैं तो मजदूरों को कम्पनियां वापस बुला रही हैं। नयों की भर्ती से बेहतर है, उन्हें ही दोबारा काम पर रखा जाए, जो काम जानते हैं। काम के तौर-तरीके समझते हैं। छत्तीसगढ़ और बिहार से उन्हें वापस बुलाने के लिए मालिकों ने बसें भेजी हैं। उनके अकाउंट में पैसे ट्रांसफर किए हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब दस लाख मजदूर वापस आए हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।

देश के अन्य भागों से भी ऐसी ही खबरें आ रही हैं। मुम्बई की एक फार्मा कम्पनी ने मजदूरों को बुलाने के लिए हवाई जहाज के टिकट भेजे हैं। कई कम्पनियों ने रेल और बस के टिकट भेजे हैं। वे इनके रहने, खाने, आवास और सुरक्षा का भी बंदोबस्त कर रही हैं। यही नहीं, जिन गांवों की तरफ ये गए हैं, वहां के प्रधानों से बात की जा रही है। अधिकारियों से सम्पर्क कर इन्हें वापस भेजने का आग्रह किया जा रहा है।

दरअसल, मजदूरों का दोहरा मोहभंग हुआ है। पहले वे मुसीबत देखकर, शहरों से भागे। लेकिन गांवों में भी उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया। दिल दहलाने वाली तस्वीरें आईं। किसी युवक ने क्वारंटाइन का चौदह दिन का समय काटने के लिए पेड़ का सहारा लिया तो कोई औरत अपने दुधमुंहे के साथ गांव से बाहर खेत में पड़ी दिखाई दी। गांव वालों ने गांवों के बाहर बाड़ लगा दी, जिससे कि बाहर से आने वाले, चाहे अपने गांव के ही क्यों न हों, अंदर न घुस सकें।

बहुत से लोगों को चौदह दिन के क्वारंटाइन के लिए स्कूलों में ठहराया गया। जहां कई स्थानों पर रहने, खाने, यहां तक कि पानी की व्यवस्था नहीं थी। बहुत से गांवों में तो स्कूल भी नहीं थे।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की समस्याओं पर काम करने और डेवलेपमेंट सेक्टर से जुड़ी स्वस्ति का कहना है कि गांवों में मजदूरों की कद्र इसलिए भी नहीं हुई कि पहले जब वे वार, त्योहार छुट्टियों में गांव जाते थे, तब वे घर के सब लोगों के लिए छोटे-मोटे उपहार लेकर जाते थे। जेब में थोड़ा-बहुत पैसा भी होता था। फिर घरवालों को यह भी पता होता था कि वे थोड़े दिनों के लिए ही आए हैं। जल्दी ही वापस चले जाएंगे। इन दिनों तो जो जैसा बैठा था, वैसे ही भागा। खाली हाथ। बिना किसी सामान और उपहार के। गांव में रहने वाले परिजनों को लगा कि वे बोझ की तरह आ गए। पता नहीं वापस जाएंगे भी कि नहीं। संसाधनों की कमी के कारण रहने, खाने-पीने की दिक्कत भी होने लगी। शहर से परायों का अपमान झेलकर घर की तरफ दौड़े थे। गांव में अपनों की उपेक्षा और तिरस्कार को झेल नहीं सके। फिर यह भी कि अगर कम्पनियां वापस बुला रही हैं, नौकरी का भरोसा दे रही हैं, सुख-सुविधाओं का ध्यान रख रही हैं, तो चले ही जाएं। कल पता नहीं क्या हो। आज तो घर बैठे नौकरी के लिए बुलाया जा रहा है, कल मिले न मिले।

सच है, गांव में तो वैसे ही कोई रोजगार नहीं। अगर रोजी-रोटी का साधन होता, रोजगार होते, जरूरतें पूरी हो सकतीं तो गांव से शहरों की तरफ आते ही क्यों। गांवों में ज्यादा से ज्यादा मनरेगा का काम मिल सकता है, वह भी हमेशा के लिए नहीं मिलता और सबको नहीं मिलता। बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं।

हालांकि, ऐसे भी बहुत से चित्र दिखे, जहां मजदूर रुके, उन स्थानों की उन्होंने तस्वीर ही बदल दी। सीकर के एक स्कूल में जहां वर्षों से रंग-रोगन नहीं हुआ था, उसे श्रमिकों ने चमका दिया और बदले में पैसे भी नहीं लिए। ग्रेटर नोएडा के एक गांव के बाहर एक बड़े पार्क की न केवल साफ-सफाई की बल्कि पेड़-पौधे भी लगाए। इन सभी मेहनतकशों का कहना था कि वे खाली नहीं बैठ सकते। साथ ही अपने शरीर को इतना आराम भी नहीं देना चाहते कि वह काम करना ही भूल जाए।

जब से तकनीक का हमारे जीवन में प्रवेश हुआ, तब से उसे जादू की छड़ी समझा गया। मान लिया गया कि अब सब कुछ इसी की मदद से हो सकता है। श्रमिकों को बिल्कुल ही भुला दिया गया। मालिकों ने भी उनकी सुख-सुविधा, उनकी पगार में बढ़ोतरी का कोई ख्याल नहीं किया। लेकिन कोरोना के कारण जब वे अपने-अपने घरों की तरफ दौड़े और इधर लॉकडाउन खुला तो पता चला कि इन तथाकथित चमकदार उद्योगों को चलाने और अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए आज भी उनकी कितनी जरूरत है। एक समय में वे फिल्मों और सीरियल्स में भी बड़ी संख्या में नजर आते थे। उनके लिए शैलेंद्र और साहिर जैसे बड़े गीतकार बेहद सुरीले गाने लिखते थे, जहां उनके परिश्रम को पहचानने की बातें होती थीं। लेकिन जैसे-जैसे हमारे जीवन में चमक-दमक बढ़ी, हमने गरीबों और मेहनतकशों से मुंह मोड़ लिया। साहित्य तक में सत्तर के दशक के मुकाबले उनकी बहुत कम जगह बची। जबकि एक जमाने में उन्हें परिवर्तन का वाहक माना जाता था। उनके श्रम की कद्र होती थी।

हालांकि, मीडिया ने जिस तरह से इनका जाना दिखाया, इनके लौटने की खबरें नहीं दिखाईं। राजेंद्र राव का यह कथन बिल्कुल सच जान पड़ता है कि किसी भी आपदा में हुआ विस्थापन अक्सर अस्थायी होता है।

मजदूरों का लौटना एक खुशखबरी है। कम से कम उनकी घर-गृहस्थी चल सकेगी। उनके परिवार जीवन चला पाएंगे। गांव में दाने-दाने को मोहताज होने से बेहतर है, अपना रोजगार और रोटी, पानी की जरूरत को पूरा करना। फिर से एक बार यह साबित हुआ कि ये न हों, तो शहर न चले।

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