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अफगानिस्तान से पलायन की तैयारी में अमेरिका

जी. पार्थसारथी

अब इस बात के सुबूत साफ दिखाई दे रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उस दस्तावेज पर दस्तखत करने का मन बना लिया है, जिसे एक तरह से आत्मसमर्पण-प्रपत्र कहा जा सकता है। इस समझौते से वह यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि अगले साल 3 नवंबर 2020 को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से पहले अफगानिस्तान में तैनात सभी अमेरिकी सैंनिकों की वापसी हो जाए। ट्रंप का वोटर आधार, जिसमें अधिसंख्य गोरे कॉकेशियन हैं, अपने फौजी 'लड़कों की घर वापसी जल्द-से-जल्द देखना चाहते हैं ताकि अगले साल की क्रिसमस एक साथ मना सकें।

हाल ही में जारी आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2003 से लेकर 20 अक्तूबर 2018 तक अफगानिस्तान में 2372 अमेरिकी सैनिक लड़ाई में मारे गए हैं और 20,320 घायल हुए हैं। अनुमान है 1,10,000 अफगान सैनिक और नागरिक भी युद्ध में खेत हुए हैं। लेकिन क्या यह फिर से वही काम न हुआ, जिसमें अमेरिका पहले से किसी युद्धग्रस्त क्षेत्र में अपनी सैन्य आमद करता है और फिर उस लड़ाई का निर्णायक अंत किए बिना पलायन करता है? क्या यह नई बात है? तो उत्तर हैज्कतई नहीं क्योंकि यह लड़ाई अपवाद नहीं बल्कि दोहराव है। इससे पहले लंबे अर्से तक चले वियतनाम युद्ध (1964-1974) का अंत भी कुछ इसी तरह हुआ था, जब पस्त पड़ी अमेरिकी फौजों को दक्षिण वियतनाम से भागकर आना पड़ा था। तत्कालीन अमेरिकी राजदूत ग्राहम मार्टिन को तो सैगौन शहर से हेलीकॉप्टर के जरिए निकालना पड़ा था। अनुमान है उत्तरी और दक्षिणी वियतनाम में लगभग 18 लाख लोग होम हुए गए थे। इस खूनी जंग में मारे गए अमेरिकी सैनिकों की गिनती 31,952 थी और 2,00,000 घायल हुए थे। अमेरिकी पलायन के बाद वियतनाम का निजाम वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टी के हाथ आया जो आज तक जारी है। हालांकि वियतनाम वैसा वामपंथी देश नहीं बना जैसा कि अमेरिका को डर था कि वह सोवियत संघ या चीन की तर्ज पर होगा। रोचक यह है कि आज की तारीख में वियतनाम और अमेरिका के बीच नजदीकी सामरिक संबंध हैं क्योंकि दक्षिण चीन सागर में चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षा को नाथने के मंतव्य से इन दोनों ने हाथ मिलाया है। वियतनाम चीन की अकड़ भी तोड़ चुका है, जब 1979 में दोनों मुल्कों में सैन्य संघर्ष हुआ था। अगर कोई इराक युद्ध पर नजर डाले तो वहां भी अमेरिकी फौज का हाल वियतनाम जैसा हुआ था। हालांकि ईरान-इराक युद्ध के समय अमेरिका का हाथ इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन की पीठ पर था, लेकिन कुवैत पर इराक के अचानक कब्जे के बाद अमेरिका ने वहां से इराकियों के खदेडऩे के लिए शक्ति का इस्तेमाल किया था। यह पहला खाड़ी-युद्ध था। इस लड़ाई में जहां लगभग 1 लाख इराकी सैनिक मारे गए थे वहीं 382 अमेरिकी सैनिक भी ढेर हुए थे। दूसरा खाड़ी युद्ध वर्ष 2003 को शुरू हुआ था जब अमेरिका ने इराक पर झूठा इल्जाम लगाते हुए लड़ाई छेड़ दी थी कि सद्दाम हुसैन अंदरखाते परमाणु बम बना रहा है। इस युद्ध में लगभग 1,10,000 इराकी सैनिक हताहत हुए थे।हाल ही में अमेरिका के दौरे पर गए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ हुई भेंट में ट्रंप के बड़बोलेपन पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है, जब उन्होंने कहा: 'कश्मीर पर मध्यस्थता करने के लिए मोदी ने मुझ से आग्रह किया था। समाचारपत्र वाशिंगटन पोस्ट ने रहस्योद्घाटन किया है कि ट्रंप ने 2017 में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद अब तक 10,769 दफा झूठ कहा है या भ्रामक वक्तव्य दिए हैं। दुनिया के कई देशों के नेताओं के बारे में ट्रंप ने ऊलजलूल बातें कही हैं। उन्होंने पड़ोसी देशों कनाडा और मेक्सिको के नेतृत्व के अलावा अपने यूरोपियन सहयोगी देशों जैसे कि फ्रांस और जर्मनी और यहां तक कि जापान को भी नहीं बख्शा है। भारत सरकार ने मध्यस्थता वाली बात पर कड़ी प्रतिक्रिया न देते हुए उक्त झूठ को बड़ी शालीनता के साथ नकार दिया है। ट्रंप अंतरराष्ट्रीय संधियों की भी इज्जत नहीं करते। बात चाहे मुक्त व्यापार संधि, विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों को मानने की हो या पर्यावरण परिवर्तन का मुद्दा या ईरान के साथ हुए परमाणु कार्यक्रम करार तक को मान्यता देने से उन्होंने इनकार दिया है।

ट्रंप के विचार यथार्थ पर कितने खरे उतरे हैं, इस पर निर्णय देना फिलहाल जल्दबाजी होगी। क्या वे इरमान खान और उनसे ज्यादा प्रभाव रखने वाले पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष बाजवा को अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज का निर्विध्न पलायन सुनिश्चित करने पर राजी कर पाए हैं? तालिबान को खुश करने में ट्रंप को अगर अपनी पीठ को चक्रासन में लाना पड़ा तो वह भी कर डाली है। और तो और इस फेर में अफगानिस्तान की चुनी हुई सरकार के राष्ट्रपति अशरफ गनी तक को नजरअंदाज किया गया है जबकि इसी साल सितंबर माह में वहां राष्ट्रपति चुनाव होने जा रहे हैं। इसी बीच अफगानिस्तानी सेना को हालिया तालिबानी हमलों में भारी जानी नुकसान उठाना पड़ा है। अमेरिका की नीतियों में राष्ट्रपति गनी की आगे सुनवाई होगी, इस बात की संभावना क्षीण है।यहां यह मानना भी सही नहीं होगा कि अफगानिस्तान में तालिबान का दबदबा चंहुओर है क्योंकि यह मुख्यत: पश्तूनों का संगठन है जो अफगानिस्तान की कुल आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हैं। हालांकि उनका वजूद ज्यादातर पाकिस्तान के संरक्षण और मदद पर टिका हुआ है। परंतु पाकिस्तान में जो पश्तून बसते हैं, खासकर अफगानिस्तान की सीमा के साथ लगते जनजातीय इलाकों में, उनका झुकाव पश्तून राष्ट्रवादी विचार रखने वाले संगठन जैसे कि तहरीक-ए-तालिबान ऑफ पाकिस्तान और पश्तून तहाफुज़ आंदोलन की तरफ ज्यादा है और वे अंग्रेजों द्वारा खींची गई ड्यूरंड लाइन नामक पाक-अफगान सीमा को बतौर अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा न तो मान्यता देते हैं, न ही परवाह करते हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज का पलायन होने के बाद हो सकता है कि बहुत से अफगानी पश्तून पाकिस्तानी सेना की उस मांग को नजरअंदाज करना शुरू कर दें, जिसमें वह उनसे अपनी सीमा के अंदर बसे और विद्रोह पर आमादा पाकिस्तानी पश्तूनों का साथ न देने को कहती है।

पिछले दो दशकों से ज्यादा समय से भारत ने अफगानिस्तान में विकास कार्य करवाते हुए, अपने नर्म और गैर-दखलअंदाजी वाले रवैये की बदौलत, विभिन्न जनजातीय गुटों के बीच काफी साख अर्जित की है। कुछ नेता जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई (पश्तून) और बल्ख प्रांत के राज्यपाल अता मोहम्मद नूर (ताजिक) और राष्ट्रीय खुफिया विभाग के पूर्व प्रमुख अमरोल्लाह सालेह भारत को अफगानिस्तान का एक भरोसेमंद मित्र मानते हैं।

ट्रंप अपने मुल्क में गृह और सैन्य विभाग की ओर से आने वाले इन दबावों का सामना कर रहे हैं कि अफगानिस्तान से उतावली में सारे सैनिक एक साथ न निकाले जाएं। अगर ट्रंप अगले राष्ट्रपति चुनाव से पहले सभी अमेरिकी सैनिकों की वापसी एक साथ करवाना तय करते हैं, तब उस सूरत में हो सकता है अमेरिकियों को आनन-फानन में ठीक उसी तरह अफगानिस्तान से भागना पड़ेगा जैसा कि सैगौन में करना पड़ा था। अगर वे धीरे-धीरे और टुकड़ों में सैनिक वापस लाते हैं और इस बीच अफगान सेना और उसके सहयोगी जनजातीय गुटों को प्रशिक्षण और हथियारों से लैस करते हैं तो इससे तालिबान का सामना करने को एक भरोसेमंद फौज तैयार हो पाएगी, जिसे स्थानीय लोगों का मदद और सहयोग प्राप्त होगा। यदि दक्षिण अफगानिस्तान अस्थिर होता है तो पाकिस्तान की अपनी स्थिरता को ड्यूरंड रेखा के आरपार से पैदा होने वाली चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा, इतना तय है।


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