• dainik kshitij kiran

अपराध की जड़ें


निस्संदेह, विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधियों का यही हश्र अपेक्षित था। लेकिन देश में कानून का राज है। कानून हर अपराधी को न्यायिक व्यवस्था के दायरे में सजा देने की बात करता है। खुद पुलिस के पास पहुंचे व्यक्ति का एनकाउंटर करने में पुरानी कहानी दोहराने से कानून के शासन और मानवाधिकारों का भी उल्लंघन होता है, जिसे आलोचक तालिबानी न्याय की संज्ञा देते हैं। तीन जुलाई के कांड के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने विकास के पांच गुर्गों को एक जैसी कहानी दिखाकर ठिकाने लगाया। जाहिर है पुलिस की यह सोच रही होगी कि यदि विकास को न्यायिक प्रक्रिया पाने का मौका दिया गया तो वह कानून व न्यायतंत्र की कमजोरियों का लाभ उठकार फिर सजा से बच सकता है। वह फिर जेल के भीतर से अपना गैंग चला सकता है। यह भी कि जो अपराधी थाने के अंदर एक मंत्री की हत्या कर सकता है और दबिश देने गये पुलिस के आठ लोगों की निर्मम हत्या कर सकता है, वह भविष्य में पुलिस के लिये सिरदर्द ही साबित होगा। लेकिन यह तार्किक नहीं लगता कि अपराधी के व्यवहार जैसा व्यवहार भी पुलिस दोहराये। ऐसे एनकाउंटर की जद में कई बार निर्दोष लोग भी आ जाते हैं। बहरहाल, बिरकू कांड के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने जिस तरह कैमरों के सामने अपनी दबंगई दिखाते हुए विकास व उसके मामा का घर उजाड़ा व कारें तोड़ीं, उसे आदिम न्याय के सिवाय क्या कहा जाये? निस्संदेह तीन जुलाई को पुलिस दल के साथ हुई बर्बरता के बाद पुलिस का उत्तेजित होना स्वाभाविक था। यह अपनी किस्म का पहला मामला था जब नागरिक क्षेत्र में पुलिस पर बड़ा हमला हुआ हो, जबकि नक्सलवादियों व आतंकवादियों द्वारा ऐसे हमले आम होते हैं। इससे पुलिस ही नहीं, आम लोगों का मनोबल भी गिरता है। लेकिन सवाल यह है कि साठ मामले दर्ज होने के बावजूद विकास के खिलाफ पुलिस ने पहले मोर्चा क्यों नहीं खोला। वह तो कानपुर के टॉप टेन बदमाशों में भी शामिल नहीं था।

सवाल यह भी है कि जब डीएसपी देवेंद्र मिश्र द्वारा कानपुर के उच्चाधिकारियों को विकास दुबे और पुलिस विभाग की काली भेड़ों की मिलीभगत की जानकारी दी गई थी तो इस मामले में कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या पुलिस में ऐसा साहस नहीं था या वह राजनीतिक दबाव में थी? उलटे शिकायत करने वाले डीएसपी को निर्मम तरीके से मार दिया गया। यानी विकास को उनके शिकायत करने की सूचना थी। यहां सवाल पुलिस में राजनीतिक हस्तक्षेप का तो है ही, पुलिस की कार्यशैली और साहस का भी है। सवाल यहां यह?भी उठता है कि हम आज तक ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बना पाये कि मुठभेड़ की विश्वसनीयता बनी रही। बहुत कम मामले ऐसे आये हैं जब फर्जी मुठभेड़ करने वालों को सजा हुई हो। विकास दुबे की मुठभेड़ को लेकर जो कहानी बतायी जा रही है, उसको लेकर पूरे देश में सवाल उठाये जा रहे हैं। उसकी गाड़ी बदलने व छाती पर गोली लगने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह भी कि उसकी मौत से उसे संरक्षण देने वाले राजनेताओं और संदिग्ध पुलिस वालों की भूमिका की जांच पर पर्दा पड़ गया है। निस्संदेह इस मुद्दे पर बयानबाजी राजनीतिक कारणों से भी जारी है, मगर कुछ सवाल तार्किक भी हैं। निस्संदेह एक सप्ताह चले इस प्रकरण का सच पूरा देश जानना चाहता है। उन पुलिसकर्मियों के परिजन भी जो तीन जुलाई को शहीद हुए थे। जनता को यह नहीं लगे कि हर एनकाउंटर में एक जैसी स्क्रिप्ट दोहरायी जाती है, सिर्फ गैंगस्टर का नाम ही बदला हुआ होता है। वह हथियार छीनकर भागता है, मगर गोली नहीं चला पाता। यहां सवाल यह भी उठता है कि क्यों दुर्दांत अपराधियों को कानूनी प्रक्रिया से शीघ्र दंडित नहीं किया जाता। क्यों गवाह बार-बार मुकर जाते हैं। यह भी कि पुलिस सुधारों को कब तक अमल में लाया जायेगा। पुलिस को पर्याप्त संसाधन, हथियार व प्रशिक्षण कब उपलब्ध कराया जायेगा। राजनीतिक हस्तक्षेप से पुलिस कब मुक्त हो सकेगी।

0 views0 comments

Recent Posts

See All

सोने की लंका लुटी पांच सितारा उपचार में

आलोक पुराणिक कबीरदास सिर्फ संत ही नहीं थे, अर्थशास्त्री थे। उनका दोहा है—सब पैसे के भाई, दिल का साथी नहीं कोई, खाने पैसे को पैसा हो रे, तो जोरू बंदगी करे, एक दिन खाना नहीं मिले, फिरकर जवाब करे। सब पैस

पश्चिम बंगाल में चुनावी कटुता भुलाने का समय

कृष्णमोहन झा/ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्र की मोदी सरकार के बीच टकराव का जो सिलसिला ममता बनर्जी के दूसरे कार्यकाल में प्रारंभ हुआ था वह उनके तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही पहले स

उत्पादकता बढ़ाने में सहायक हो ऋ ण

भरत झुनझुनवाला वर्तमान कोरोना के संकट को पार करने के लिए भारत सरकार ने भारी मात्रा में ऋण लेने की नीति अपनाई है। ऋण के उपयोग दो प्रकार से होते हैं। यदि ऋण लेकर निवेश किया जाए तो उस निवेश से अतिरिक्त आ